
कांग्रेस नीत यू.पी.ए. सरकार द्वारा मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत और ङ्क्षसगल ब्रांड रिटेल में 100 प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश की इजाजत देने का फैसला क्या रेखांकित करता है? पिछले कुछ समय से बहुराष्ट्रीय कंपनियां इसके लिए लॉङ्क्षबग कर रही थीं। सरकार के इस निर्णय से बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जीत तो हुई ङ्क्षकतु इससे भारतीय हितों को व्यापक क्षति पहुंचने की संभावना है। सरकार का यह निर्णय वस्तुत: नीतिनियंताओं के भारत की कृषिगत ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नासमझी की देन है। खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश खोलने से जहां पेशागत खुदरा व्यापार को क्षति पहुंचेगी, वहीं इसके कारण ग्रामीण भारत में खाद्य सुरक्षा पर भी खतरा पैदा होगा। इससे ग्रामीण और शहरी, दोनों उपभोक्ताओं पर दूरगामी दुष्परिणाम पडऩे के साथ भारत की उत्पादन क्षमता को भी गहरा धक्का लगने का खतरा है।
विदेशी निवेश का द्वार खोलने के समर्थकों का दावा है कि इससे ग्रामीण क्षेत्र और किसानों में समृद्धि आएगी। ङ्क्षकतु 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) के लिए ‘‘कृषि, विपणन और आंतरिक व बाह्य व्यापार’’ के संदर्भ में योजना आयोग द्वारा गठित कार्यदल की रिपोर्ट ग्रामीण भारत की सही तस्वीर उकेरती है। पश्चिमी देशों की तुलना में भारत के कृषिगत क्षेत्र का आकलन करने पर सच्चाई सामने आ जाती है। भारत के 32 करोड़ से ज्यादा ग्रामीण कृषि पर ङ्क्षजदा हैं। उनकी खेती का आकार 5 एकड़ या उससे भी कम है। इसकी तुलना में कनाडा में 1798 एकड़, अमरीका में 1089 एकड़, आस्ट्रेलिया में 17975 एकड़, फ्रांस में 274 और ब्रिटेन में 432 एकड़ है। भारत की तुलना में अमरीका में खेती का आकार 250 गुना बड़ा तो आस्ट्रेलिया का 4000 गुना ज्यादा बड़ा है। इसलिए अमरीका या पश्चिमी देशों में खेत से वालमार्ट के चैनलों तक होने वाली आपूॢत (फार्म गेट टू वालमार्ट थ्योरी) की कल्पना भारत में नहीं की जा सकती।
‘फार्म गेट टू वालमार्ट थ्योरी’ में बिचौलियों और छोटे किसानों के लिए कोई जगह नहीं है। भारत में इस सिद्धांत को देखें तो अभी गन्ने की आपूॢत चीनी मिलों तक इसी तरह होती है। ङ्क्षकतु यदि गन्ने का मूल्य सरकार तय न करे और उसे बाजार पर छोड़ दिया जाए तो गन्ना उत्पादकों के सामने भुखमरी की हालत आ जाएगी। यदि बड़ी कंपनियों से किसानों को ज्यादा खुशहाली मिलती तो अमरीका और यूरोप को अपने किसानों को प्रतिदिन एक बिलियन डॉलर सबसिडी देने की नौबत नहीं आती।
भारत के सकल खेती उद्योग में छोटे खेतों की हिस्सेदारी 34 प्रतिशत है ङ्क्षकतु उनमें 41 प्रतिशत खाद्यान्न का उत्पादन होता है। उनकी उत्पादन क्षमता 33 प्रतिशत अधिक है। छोटे खेतों को बड़े खेतों में परिवॢतत कर दें तो खाद्यान्न उत्पादन में 7 प्रतिशत की गिरावट आ जाएगी। यह केवल खाद्यान्न की स्थिति नहीं है। छोटे और मझोले फार्मों से 100.9 मिलियन टन दूध का उत्पादन होता है। इसलिए भारत में फुटकर किसानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। योजना आयोग द्वारा गठित कार्यदल ने भी यही निष्कर्ष दिया था, ‘‘भारत में छोटे और मझोले किसानों को हालांकि अनेकों चुनौतियां झेलनी हैं, ङ्क्षकतु वे लंबे समय तक टिके रहेंगे इसलिए छोटे और मझोले किसानों के लिए बनने वाली नीतियों का पूरी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है।’’
भारत का 60 प्रतिशत से अधिक खाद्य उत्पाद मंडियों तक पहुंच ही नहीं पाता। वह गांव के स्तर पर ही उपभोग कर लिया जाता है। किसान खाद्यान्न का बड़ा भाग निजी उपभोग, काम के बदले श्रमिकों को अनाज देने और बीज व मवेशियों के चारे के रूप में उपयोग करता है। यदि इस 60 प्रतिशत का छोटा भाग भी वॉलमार्ट के चैनलों में जाता है तो निश्चित तौर पर वे इसकी कीमत शहरी मानकों पर तय करेंगे। छोटे किसान और भूमिहीन कृषि श्रमिक तब क्या इस कीमत को सहन करने की स्थिति में होंगे? कोंकण के अल्फांसो आम और केरल के मछली व्यापार का यही हश्र हुआ। कोंकण के लोग अल्फांसो देखते तो हैं पर खा नहीं सकते। अधिक कीमतों के कारण वे इसका निर्यात करते हैं और बदले में मिला धन महंगी शहरी वस्तुओं की खरीद में ही स्वाहा हो जाता है।
भारतीय किसानों द्वारा उत्पादित 40 प्रतिशत अतिरिक्त खाद्यान्न बाजार में कैसे पहुंचता है? मंडियों में पहुंचने वाला करीब 35 प्रतिशत खाद्यान्न पारंपरिक हाट-बाजार आदि के माध्यम से मंडियों में पहुंचता है जबकि सीधे मंडियों तक पहुंच केवल 5 प्रतिशत खाद्यान्न की ही है। सरकार यहीं से अनाज खरीद कर देश के लिए खाद्यान्न का भंडारण करती है। ङ्क्षकतु जिस हाट- बाजार में 35 प्रतिशत खाद्यान्न की आवक है, वह किसानों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक सूचनाओं के आदान-प्रदान का सेतु भी है। इसीलिए योजना आयोग द्वारा गठित कार्यदल ने सरकार को परामर्श देते हुए कहा था कि ‘‘किसानों को सरकार के पास बुलाने की बजाए सरकार को ऐसे हाट-बाजारों में किसानों के उचित मार्गदर्शन के लिए अपना कार्यालय खोलना चाहिए।’’ यू.पी.ए. सरकार वस्तुत: कार्यदल द्वारा सुझाए ङ्क्षबदु पर वालमार्ट के कारोबारियों को भेजना चाहती है, जिनकी एकमात्र नीति सस्ते बाजार से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है।
भारत में दुनिया की आबादी का छठा भाग निवास करता है। स्वाभाविक तौर पर अमरीका और यूरोप की नजर इस विशाल आबादी की दैनंदिनी जरूरतों पर टिकी है। लेन-देन किसी भी व्यापार का अंग है। ङ्क्षकतु भारत का इतना बड़ा बाजार विदेशी निवेश के लिए खोलने के बदले में हमने क्या पाया? अमरीका और यूरोप जहां अपने उद्योग-धंधों को निरंतर संरक्षण प्रदान कर रहे हैं, वहीं यू.पी.ए. सरकार ने भारतीय खुदरा व्यापार की अनदेखी कर एकपक्षीय निर्णय कर डाला।