न्यू पेंशन स्कीम से दम तोड़ता बुढा़पा

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Friday, February 17, 2017-3:22 PM

आज पूरे देश के साथ-साथ प्रदेश में भी 2003 के बाद नियुक्त होने वाले कर्मचारियों में नई पेंशन योजना (एनपीएस) को लेकर दिन ब दिन रोष बढ़ता जा रहा है। विरोध होना भी लाजिमी है बडी़ विचित्र बात है कि कर्मचारी लोकतंत्र में जिन सरकारों को मां का दर्जा देते हैं वही मां अपने बच्चों को बुढ़ापे में भूखे मरने के लिए छोड़ रही है। यह सच है कि सरकारी सेवा क्षेत्र में नौकरियों के अवसर समय के साथ-साथ कम हुए हैं फिर भी आज जिन लोगों को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिल रही है संतोष उन्हें भी नहीं है। इसकी मुख्य वजह है पहले तो नौकरी का अनुबंध पर मिलना दूसरा सबसे बड़ी चिंता जो इस समय इन कर्मियों के लिए बनी हुई है वो है सेवाकाल के बाद बिना पेंशन के बुढापा। आखिर पेंशन की चिंता क्यों जायज है।

मैं कुछेक पहलुओं पर सबका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि पुरानी पेंशन क्यों जरूरी है। भारतीय संविधान ने सबको समानता का अधिकार दिया लेकिन व्यवस्था ने समय के साथ अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इसको समानता की जगह असमानता में बदल दिया। बात हो रही है पुरानी पेंशन की तो 2003 के बाद सरकारी क्षेत्र में नियुक्त होने वाले कर्मियों के लिए केंद्रीय व राज्य सरकारों ने पुरानी पेंशन बंद कर दी उसकी जगह नई पेंशन स्कीम शुरू कर दी गई। शुरू में इसका जितना विरोध होना चाहिए था वह नहीं हो पाया किसी भी चीज़ या योजना के परिणाम उसके लागू होने के 10.15 वर्षों बाद सामने आते हैं। यहां भी यही हुआ आज 10.12 वर्षों बाद नई पेंशन स्कीम के परिणाम या दुष्परिणाम कहें सामने आ रहे हैं। अब जो कर्मी 2003 के बाद नियुक्त हुआ है उसे 10.15 वर्ष के सेवाकाल बाद मात्र 1हजार के लगभग पेंशन मिल रही है। इसके जीवंत उदाहरण अभी हाल ही में प्रदेश के कांगडा जिले में कुछेक जेबीटी शिक्षकों की सेवानिवृति पर देखने को मिला। इस बात से कोई भी मुंह नहीं मोड सकता कि मात्र 1 हजार की पेंशन पर एक एक सेवानिवृत्त व्यक्ति कैसे अपना व अपने परिवार का पेट पाल सकता है।

ये कैसा समानता का अधिकार है कि एक ही पद पर नियुक्त कर्मी जब सेवानिवृत्त होते हैं तो एक कर्मी को 25 हजार की पेंशन और दूसरे को उतने ही सेवाकाल बाद 1 हजार की पेंशन आखिर ये कैसी समानता है। हमारी सरकारें इतना भी नहीं समझ पाई कि कर्मियों के लिए तो न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) लागू कर दी लेकिन खुद के लिए वही पुरानी पेंशन मतलब माननीय चाहे एक वर्ष तक निर्वाचित रहे उसे पुरानी पेंशन और कर्मचारी चाहे 20 वर्ष का कार्याकाल पूरा कर ले उसे 1 हजार की नाममात्र पेंशन। इस देश का दुर्भाग्य कहें या नेताओं का सौभाग्य एक बार जनप्रतिनिधि चुनें जाने के बाद वे ता-उम्र पेंशन के हकदार बन जाते हैं भले ही वह अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा भी ना कर पाएं।

मैं नई व पुरानी पेंशन के तकनीकी पहलुओं पर नहीं जाना चाहता मैं तो उन सामाजिक पहलुओं पर सबका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं जिसकी तस्वीर बहुत दर्दनाक है। सबसे मुख्य बात पुराने कर्मियों का जीपीएफ कटता है जो सरकारी खजाने में जाता है और ब्याज भी वर्तमान दर का देय होता है वहीं नई पेंशन स्कीम में कर्मचारी का सीपीएफ कटता है जिसमें कर्मचारी के मूल वेतन की 10% राशि कटती है जबकि इतनी ही राशि सरकार या नियोक्ता द्वारा डाली जाती है। यह सब राशि शेयर बाजार में लगती है इसे सरकारी खजाने में नहीं रखा जाता यहां भी सरकार ने एक कर्मी की जमा पूंजी को बाजार के हवाले कर दिया। कोई गारंटी नहीं। 

एक कर्मचारी पहले जीपीएफ अपनी मर्जी से जमा करवा सकता था लेकिन अब नई पेंशन स्कीम के अधीन कर्मी चाह कर भी बचत नहीं कर सकता। इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता कि जहां कर्मचारी जितनी राशि जमा कर रहे हैं उनकी वह राशि शेयर बाजार में जाकर कम हो रही है। अंत में भी तरह-तरह की औपचारिकताएं पूरी करने पर अपने जमा की पूरी पूंजी नहीं मिल पाती। आज सामाजिक सुरक्षा सभी के लिए जरूरी है। आज चाहे गांव हो या शहर वर्तमान में एकल परिवारों का चलन है संयुक्त परिवार अब नहीं रहे। एक कर्मी जिसने 15-20 साल सरकारी नौकरी करने के बाद अपने बच्चों व परिवार पर अपनी सारी जमा पूंजी खर्च की लेकिन जब बुढापा आया तो वही बच्चे मां-बाप को छोड़कर चले जाते हैं। इससे दुखदायी और क्या हो सकता है कि अपनी जमा पूंजी को खत्म कर एक इंसान को सरकार ने भी बेसहारा छोड़ दिया वहीं उसके अपने भी छोड गए। व्यवस्था से भी कुछेक प्रश्नों का समाधान चाहूंगा कि यदि पुरानी पेंशन से देश का वित्तीय घाटा बढ़ा तो क्या माननीयों की पेंशन से यह घाटा नहीं बढ़ा होगा। एक बात समझ नहीं आई कि यदि 2003 के बाद नियुक्त होने वाले कर्मचारियों की पुरानी पेंशन स्कीम बंद कर दी तो फिर 2003 के बाद चुने जाने वाले माननीयों की पेंशन क्यों बंद नहीं की। यहां से हमारी सरकारों की अंग्रेज़ी हकमूत व नीतियों की यादें तरोताजा हो जाती है मैंने अंग्रेज तो नहीं देखे लेकिन ऐसी नीतियों से यह आभास जरूर होता है कि वह भी ऐसे ही होंगे क्योंकि उन्होंने भी नियम आम लोगों के लिए बनाए थे खुद के लिए नहीं।

किसी लोकतांत्रिक देश में कल्याणकारी राज्य ही वहां की परिभाषा है। वर्तमान में पूरे देश में पुरानी पेंशन की मांग उठ रही है क्योंकि नई पेंशन स्कीम के परिणाम अब जाकर सामने आ रहे हैं। वैसे भी यह तो कदापि न्यायोचित नहीं की केवल समय के आधार पर आप अपने कर्मचारियों को अलग-अलग पेंशन दें वह भी तबए जब वह एक ही पद पर एक.समान सेवाकाल पूरा करके सेवानिवृत्त हुए हो। बस केवल इस अंतर के आधार पर एक को पेंशन से वंचित रखा जा रहा है कि वह 2003 के लिए बाद नियुक्त हुआ है। सबसे बड़ी बात तो यह हे कि जो चीज कर्मियों पर लागू हो वह उन जनप्रतिनिधियों पर भी होनी चाहिए जो 2003 के बाद चुनें गए हों। क्योंकि अपने फायदे के लिए नियमों में ढील देना संविधान के मौलिक अधिकारों का हनन हैं। जबकि यह अधिकार सबको और सब पर एक समान लागू होते हैं। आज जरूरत है सरकारी क्षेत्र को ऊपर उठाने की और इसको उपर मात्र वहां के कर्मी ही उठा सकते हैं लेकिन वह भी तभी ऊपर उठा पाएंगे जब बिना डर भय के कार्य कर पाएंगे। कोई भी इंसान वर्तमान स्थिति से खुश नहीं होता वह खुश होता है अपने भविष्य को देखकरए भविष्य की तस्वीर ही उसकी वर्तमान क्षमता को बढ़ाती है। उम्मीद है देश प्रदेश की सरकारें अपनी कर्मचारियों के लिए उसी पेंशन को बहाल करेंगी जिस पेंशन की हमारे माननीय व 2003 से पहले के कर्मी उपभोग कर रहे हैं।

-राजेश वर्मा (मंडी)
हिमाचल प्रदेश


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