उम्मीद है राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस का पतन रुक सकेगा

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Friday, December 08, 2017-3:25 AM

राहुल गांधी द्वारा देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष पद के चुनाव हेतु नामांकन पत्र दायर करने के साथ पहले से ही तय बात को औपचारिक रूप देने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। नामांकन पत्रों का केवल एक ही सैट दायर होने के कारण 11 दिसम्बर, 2017 को राहुल गांधी की भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में घोषणा महज एक तकनीकी औपचारिकता बन कर रह गई है। 

वैसे तो कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने के दिन से ही वह पार्टी के वास्तविक नेता के रूप में काम कर रहे थे लेकिन अब यह तथ्य कानूनी रूप धारण करने जा रहा है। नेहरू-गांधी परिवार के छठे सदस्य को कमान सौंपे जाने से कांग्रेस संगठन के अंदर इसका स्वरूप बदलने वाले परिवर्तन होने की उम्मीद है और इन परिवर्तनों से यह उम्मीद भी की जानी चाहिए कि 2014 से देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का जो पतन निर्बाध रूप में चला आ रहा है वह रुक सकेगा। पार्टी अध्यक्ष के रूप में राहुल की पदोन्नति से यह उम्मीद है कि पार्टी संगठन अब आधुनिक, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक भारत की आकांक्षाओं से तारतम्य बैठा सकेगा। 

राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के प्रति बढ़ते मोह भंग के चलते एक स्पष्ट राजनीतिक विकल्प की जरूरत बहुत शिद्दत से महसूस की जा रही है। इस परिप्रेक्ष्य में राहुल गांधी के सामने कांग्रेस का अतीत गौरव बहाल करने के साथ-साथ भारत की गणतांत्रिक आत्मा पर हो रहे सीधे हमले को विफल बनाने की भारी-भरकम चुनौती होगी। यह काम करने के लिए उन्हें दिल और दिमाग दोनों से नेतृत्व करना होगा ताकि वह भारत की जनता में उत्साह जगा सकें और उसके स्नेह के पात्र बन सकें। 

नामित अध्यक्ष को यह कठिन विकल्प चुनने होंगे कि ठीक क्या है और किस बात से क्षणभंगुर राजनीतिक मजबूरियों की ही साधना होगी। जिस गांधीवादी परम्परा का झंडा बुलंद रखने की कसम खाई है, उस परम्परा की भावनानुरूप आवश्यक निर्णय लेते हुए उन्हें हर हालत में लगातार यह स्मरण रखना होगा कि जो बात नैतिक दृष्टि से सही है, जरूरी नहीं कि राजनीतिक दृष्टि से भी वह सही हो। अल्पकालिक राजनीतिक लाभों के लालच में फंसने की बजाय उन्हें अवश्य ही दृढ़ता से सिद्धांतों पर पहरा देना होगा। वास्तव में ‘‘सही काम करने, देश भर में उन्हें लोगों से समर्थन हासिल करने का नैतिक अधिकार मिलने की मजबूरी में से ही उनके नेतृत्व का अभ्युदय होना चाहिए।

उन्हें महात्मा गांधी की इस नसीहत से अवश्य ही लाभान्वित होना होगा कि... एक नेता को उसके आचरण की शुद्धता, मिशन के नि:स्वार्थपन और दूरदृष्टि के आधार पर ही परखा जाता है।’’ वास्तविक राजनीति के मार्ग पर चलने वालों द्वारा बेशक राजनीतिक व्यवहारवाद की वकालत बार-बार की जा रही है तो भी राहुल गांधी को शक्ति आदर्शवाद के सिद्धांतों पर अडिग रहने से ही हासिल होगी। वह अपने पडऩाना तथा अपने पिता द्वारा स्थापित मिसालों से शक्ति हासिल कर सकते हैं जिन्होंने राजनीतिक नैतिकता तथा इंसाफपसंदी के उच्चतम मानकों के सहारे ही अपनी राजनीति चलाई। 

जैसे-जैसे वह 132 वर्ष पुरानी पार्टी की जटिलताओं का प्रबंधन करेंगे और पार्टी में चल रही जबरदस्त अंतर्कलह का समाधान करेंगे, वैसे-वैसे उनकी छवि एक ऐसे निष्पक्ष भाग्यविधाता की बन जाएगी जो पार्टी के सभी लोगों की आवाज सुनना और उनकी गरिमा बनाए रखना सुनिश्चित करता है। जिस प्रकार उनकी मां सदैव पार्टी के अंदर सर्वसम्मति पैदा करने की व्यापक लोकतांत्रिक अभिलाषा रखती आई हैं और जिसके बूते वह बहुत बुरे तथा अग्नि परीक्षा जैसे दिनों में पार्टी को एकजुट रखने में सफल रही हैं, राहुल को हर हालत में उसी परम्परा को आगे बढ़ाना होगा। 

सबसे बड़ी बात तो यह है कि लोगों की परख करते समय उन्हें अवश्य ही ईमानदार लोगों की पहचान करनी होगी। जो लोग बहुसंख्य राय के समक्ष भी अपनी आत्मा की आवाज पर पहरा देते हुए विचारों की अभिव्यक्ति करते हैं उनके मामले में राहुल को संवाद, विचार-विमर्श तथा वाद-विवाद व वार्तालाप  को प्रोत्साहित करना होगा और साथ ही ऐसा वातावरण सुनिश्चित करना होगा कि किसी राजनीतिक बदलाखोरी के भय से मुक्त होकर पार्टी कार्यकत्र्ता व नेता अपने विचार प्रस्तुत कर सकें। यह तभी हो सकेगा यदि उनके लिए पार्टी अध्यक्ष तक पहुंचना आसान होगा। ऐसी स्थिति पैदा होने से पार्टी अध्यक्ष भी कोई निर्णय लेने से पहले भिन्न-भिन्न विचारों से अवगत हो सकेंगे। जरूरत इस बात की है कि कार्यकत्र्ता और नेता राहुल से भयभीत होने की बजाय उन्हें भी उसी तरह स्नेह की नजर से देखें जैसे वे राजीव गांधी को देखते थे। स्नेहशीलता व विनम्रता और दयाभाव हर हालत में उनके नेतृत्व की खूबियों में शामिल होने चाहिएं। 

एक युवा अध्यक्ष पार्टी का नेतृत्व संभालेगा तो यह उम्मीद करनी बनती है कि पार्टी नेतृत्व का कायाकल्प ऐसे समय में करना होगा जब गणतांत्रिक जीवन मूल्यों पर खतरा मंडरा रहा है। जाति, सम्प्रदाय एवं क्षेत्र पर आधारित गणनाओं के साथ-साथ सामाजिक और आॢथक विषमताओं ने राजनीतिक तंत्र को छिन्न-भिन्न कर दिया है। ऐसे में  राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस में यह चुनौती होगी कि वह न केवल इन खाइयों को फिर से पाट दें बल्कि राजनीतिक संवाद के नियमों को भी फिर से परिभाषित करें। शुरूआती रूप में उन्हें अवश्य ही सार्वजनिक संवाद का स्तर ऊंचा उठाना होगा और दूसरों के लिए एक मिसाल कायम करनी होगी, जैसा कि वह गुजरात में अपने सशक्त चुनावी अभियान में कर रहे हैं। 

स्पष्ट है कि हमें राजनीतिक संवाद का ऐसा मुहावरा अपनाना होगा जो समावेषण, उदारवाद, सैकुलरवाद एवं सामाजिक न्याय पर केन्द्रित हो और हमें विद्वेष एवं तोहमतबाजी पर केन्द्रित विचार-विमर्श से दूर ले जाए। राहुल गांधी को अवश्य ही ऐसे नेतृत्व का प्रतीक बनना होगा जो राष्ट्र के नवीनीकरण के प्रति अडिग प्रतिबद्धता एवं स्वार्थहीनता से शक्ति अर्जित करता हो। देश की सबसे पुरानी पार्टी के नेता के रूप में उनसे यह उम्मीद है कि वह नरमपंथी केन्द्रवाद के रास्ते पर चलेंगे और वैचारिक अतिवादिता से परहेज करेंगे। उनका नेतृत्व ऐसा होना चाहिए जो हाशिए पर जीने वाले और पददलित लोगों के मन में आशा के दीप जलाए। उन्हें देश की इच्छा शक्ति को जागृत करने वाले प्रवर्तक बनना होगा और इच्छा शक्ति को मूर्तरूप देने का नेतृत्व करना होगा। इस विराट कार्य में राष्ट्र को उन्हें अवश्य ही शुभकामनाएं देनी चाहिएं।-अश्वनी कुमार

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