कांग्रेस में नेहरू ने ही बोया था ‘परिवारवाद’ का बीज

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Friday, December 08, 2017-3:33 AM

आखिर जैसी संभावना थी, वैसा ही हुआ। 47 वर्षीय राहुल गांधी का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अगला अध्यक्ष होना तय है। नामांकन दाखिल करने के आखिरी दिन (4 दिसम्बर) किसी भी अन्य कांग्रेसी नेता ने राहुल गांधी को चुनौती नहीं दी, जोकि अपेक्षित ही था। अब बतौर कांग्रेस मुखिया राहुल गांधी के नाम की घोषणा केवल औपचारिकता भर है। 

राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने का मार्ग साफ  होने के साथ एक बार फिर से यह स्थापित हो गया है कि कांग्रेस अब भी न केवल वंशवाद की जकड़ में है, अपितु इसकी जड़ें पहले से और भी अधिक गहरी हो गई हैं। साथ ही आगे भी पार्टी का भविष्य गांधी-नेहरू परिवार से ही जुड़ा रहेगा। यह ठीक है कि कांग्रेस ने अपने अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए एक लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया था। किंतु वास्तविकता क्या है?-इसका वर्णन पूर्व केंद्रीय मंत्री, पार्टी के वरिष्ठ नेता और गांधी-नेहरू परिवारों के सबसे वफादारों में से एक मणिशंकर अय्यर ने बड़े ही सटीक शब्दों में किया है। 

नामांकन के अंतिम दिन वंशवाद के आरोपों पर सफाई देते हुए श्रीमान अय्यरजी ने कहा, ‘‘जब शाहजहां ने जहांगीर की जगह ली थी, क्या तब चुनाव हुए थे? जब औरंगजेब ने शाहजहां की जगह ली तब चुनाव हुए? यह सब जानते हैं कि जो बादशाह है, उसकी संतान को सत्ता मिलेगी।’’ ऐसा नहीं है कि गांधी-नेहरू परिवार से जुड़े लोग वंशवादी परम्परा से घृणा करते हैं अपितु अपने आगे-पीछे चक्कर काटते युवा, वरिष्ठ और बुजुर्ग कांग्रेसियों को देखना भी इस परिवार को दशकों से रास आ रहा है। तभी इसी वर्ष सितम्बर में अमरीका गए राहुल गांधी ने कांग्रेस में परिवारवाद के समर्थन में कई तर्क दिए और कहा, ‘‘हमारा देश इसी तरह काम करता है।’’ 

नेहरू-गांधी परिवार के राहुल गांधी छठे सदस्य होंगे जो कांग्रेस की कमान संभालेंगे। स्वतंत्र भारत के सर्वप्रथम प्रधानमंत्री दिवंगत पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने जीवनकाल में ही अपनी इकलौती पुत्री इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्षा बनवाकर वंशवाद का बीजारोपण कर दिया था। मोतीलाल नेहरू इस परिवार के पहले सदस्य थे जिन्होंने स्वतंत्रता से पहले 1919 में कांग्रेस अध्यक्ष का पद अमृतसर अधिवेशन में संभाला था। 1928 के कलकत्ता अधिवेशन में भी वह फिर से अध्यक्ष बने। जवाहर लाल नेहरू ने लाहौर सत्र में 1929-30 में कांग्रेस की कमान पिता मोतीलाल से अपने हाथ में ले ली। 1936-37 में पं. नेहरू पुन: कांग्रेस अध्यक्ष बने। भारत के पहले प्रधानमंत्री होते हुए पं. नेहरू 1951 से 1954 तक कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर आसीन रहे। 

राहुल गांधी की दादी श्रीमती इंदिरा गांधी वर्ष 1959 में पहली बार कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। उन्हीं की जिद और हठधर्मिता ने पं. नेहरू को जनता द्वारा चुनी केरल की तत्कालीन वाम सरकार को बर्खास्त करने और वहां राष्ट्रपति शासन थोपने के लिए विवश कर दिया। इस घटनाक्रम ने कांग्रेस में एक व्यक्ति और एक परिवार के साथ पूर्ण देश और पार्टी की पहचान को जोडऩे की गैर-लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी परम्परा की नींव डाल दी। वर्ष 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने व्यक्तिवाद से प्रेरित होकर कांग्रेस का विभाजन किया और उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस का नामकरण ‘कांग्रेस (आई)’ के रूप में हुआ।

सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए उन्होंने वामपंथियों से हाथ मिला लिया। इसी कारण पार्टी के नेता देशविरोधी शक्तियों का समर्थन और सार्वजनिक रूप से गाय के बछड़े का गला काटते दिखाई देते हैं। यही नहीं, जिस प्रकार माक्र्सवाद में एक नेता और एक विचार के प्रति समर्पण का सिद्धांत है, ठीक उसी तरह कांग्रेस में भी एक परिवार की पूजा और उसके सदस्यों की चापलूसी में ही पार्टी के अन्य सदस्यों की स्वामीभक्ति निहित है। प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा जी ने अपने छोटे बेटे संजय गांधी को राजनीति में लाने का प्रयास किया, क्योंकि बड़े बेटे राजीव गांधी की इस क्षेत्र में तब कोई रुचि नहीं थी और वह एयर इंडिया में बतौर पायलट नौकरी कर रहे थे। किंतु होनी को कुछ और ही मंजूर था।

जब 23 जून 1980 को संजय गांधी ने विमान उड़ाने का प्रयास किया तो वह दुर्घटना के शिकार हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। तब जाकर राजीव गांधी 16 फरवरी, 1981 को औपचारिक रूप से राजनीति में आए। इंदिरा गांधी सरकार द्वारा थोपे आपातकाल में मौलिक जनाधिकारों के हनन और ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’  जैसे अधिनायकवादी नारे ने 1977 के चुनाव में कांग्रेस को औंधे मुंह गिरा दिया। 1980 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने वापसी की और वह प्रधानमंत्री बनीं। इस दौरान श्रीमती गांधी 1978 से लेकर अपनी मृत्यु तक कांग्रेस की अध्यक्ष भी रहीं। 

अक्तूबर 1984 में इंदिरा जी की हत्या से उभरी सहानुभूति लहर से कांग्रेस को अप्रत्याशित सफलता मिली। राजीव गांधी अपनी मां के पदचिन्हों पर चलते हुए देश के प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष बने। 1991 में अपनी मृत्यु तक वह कांग्रेस के मुखिया बने रहे। राजीव के निधन के बाद पार्टी अध्यक्ष की कमान 7 वर्षों तक ‘खानदान’ से बाहर के पी.वी. नरसिम्हा राव व सीताराम केसरी से होते हुए 1998 में एक बार फिर नेहरू-गांधी परिवार के हाथों में जा पहुंची और राजीव गांधी की पत्नी और मूल रूप से इतालवी सोनिया गांधी पार्टी की अध्यक्षा बनीं। उनका कार्यकाल सबसे लंबा रहा, वह लगातार 19 वर्षों से पार्टी के अध्यक्ष पद पर विराजमान हैं। 

तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए उन्होंने ‘राष्ट्रीय परामर्श समिति’ के रूप में संविधानेत्तर सत्ता का केंद्र स्थापित किया था। यदि 1978 से कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर एक परिवार के कब्जे का हिसाब लगाया जाए तो कांग्रेस पर गांधी-नेहरू परिवार का ही एकछत्र राज रहा है। गत 39 में से 32 वर्षों दौरान नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य पार्टी अध्यक्ष पद पर आसीन हैं और आने वाले समय में भी यही स्थिति रहने वाली है। गांधी-नेहरू परिवार के अधीन कांग्रेस पार्टी वर्तमान समय में राजनीतिक दल न होकर एक निजी कम्पनी में परिवर्तित हो गई है, जिसका एकमात्र लक्ष्य धन-बल से सत्ता प्राप्त करना और सत्तासीन होने पर प्रचुर मात्रा में पैसा अर्जित करने तक सीमित हो गया है।-बलबीर पुंज

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