प्रदूषण पर काबू पाने की दिशा में अदालत का फैसला स्वागतयोग्य परन्तु...

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Friday, October 13, 2017-1:09 AM

अभी हाल ही में दीपावली पर पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय सामने आया। यह फैसला केवल दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों तक सीमित है तथा इसकी समयसीमा भी अल्पकालिक है। प्रदूषण नियंत्रित करने की दिशा में अदालत का फैसला स्वागतयोग्य है किन्तु अपने पीछे यह कई ज्वलंत प्रश्नों को छोड़े जा रहा है। 

दीपावली से 10 दिन पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने गत 9 अक्तूबर को दिल्ली-एन.सी.आर. में पटाखों की बिक्री और भंडारण पर रोक लगा दी। अदालत ने लोगों की सेहत और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए नवम्बर 2016 के अपने ही एक निर्देश को बरकरार रखा है। यह फैसला न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी, अभय मनोहर सप्रे और अशोक भूषण की खंडपीठ ने सुनाया है। शर्तों के साथ पटाखों की बिक्री की स्वीकृति देने वाले न्यायालय के गत 12 सितम्बर के आदेश के विरुद्ध कई अर्जियां दाखिल हुई थीं, जिनमें अदालत से उस आदेश में परिवर्तन करने की मांग की गई थी। खंडपीठ के अनुसार, ‘हमें कम से कम एक दीवाली पर पटाखे मुक्त त्यौहार मनाकर देखना चाहिए।’ अदालत ने स्पष्ट किया है कि शर्तों के साथ दिल्ली-एन.सी.आर. में पटाखा बिक्री की अनुमति देने वाला उनका आदेश 1 नवम्बर से पुन: प्रभावी होगा। 

नि:संदेह, दीवाली पर पटाखों के उपयोग से प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। क्या केवल पटाखे ही दिल्ली में प्रदूषण बढऩे का एकमात्र कारण हैं? आई.आई.टी. कानपुर की रिपोर्ट के अनुसार, वाहनों से निकलने वाला धुआं दिल्ली के प्रदूषण में 25 प्रतिशत से अधिक योगदान देता है। लचर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के कारण रोजाना वाहनों की बढ़ती संख्या और सड़कों पर मीलों लंबे यातायात जाम की समस्या भी प्रदूषण को बढ़ाने में सर्वाधिक जिम्मेदार है। 2014-15 में दिल्ली में पंजीकृत वाहनों की संख्या 88 लाख थी, जो वर्तमान समय में 1 करोड़ से अधिक हो गई है। इस दिशा में न्यायालय और सरकार द्वारा कालांतर में कई निर्णय भी लिए गए किन्तु सभी वाहनों पर एक साथ प्रतिबंध नहीं लगाया। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में किसानों द्वारा फसलों के अवशेष अर्थात पराली जलाए जाने के कारण भी दिल्ली-एन.सी.आर. की आबोहवा बिगड़ रही है। 

दमघोंटू गैस चैंबर में परिवर्तित होते हमारे पर्यावरण ने समाज के हर वर्ग को बुरी तरह प्रभावित किया है। दूषित पर्यावरण को बचाने का दायित्व भारत के सत्ता-अधिष्ठानों के साथ-साथ प्रत्येक समुदाय के हर व्यक्ति पर है। आज जिन कारणों से भी हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुंच रही है, उसके निवारण के लिए मनुष्य द्वारा आदर्श जीवनशैली का अनुसरण और वातावरण को दूषित करने वाले सभी तत्वों को चिन्हित कर उन्हें नियंत्रित करना, समय की मांग बन चुकी है किन्तु क्या इस संबंध में हमारे समाज में निष्पक्ष विवेचना हो रही है? भारत विविधताओं का देश है। यहां विभिन्न मजहबों के लाखों-करोड़ों अनुयायी न केवल सभी मौलिक अधिकारों के साथ जीवन-यापन करते हैं, साथ ही वे अपने-अपने रीति-रिवाजों, त्यौहारों, संस्कृति और परंपराओं के निर्वहन के लिए भी स्वतंत्र हैं। इस सामाजिक व्यवस्था की जड़ें भारत की सनातन बहुलतावादी संस्कृति से सिंचित हैं और हमारा संविधान इसका प्रतिबिंब। 

अक्सर देखा जाता है कि देश में जब भी दीवाली, होली आदि हिन्दू पर्व निकट होते हैं, उस समय समाज का एक वर्ग-जो स्वयं को उदारवादी और प्रगतिवादी भी कहता है, वह पर्यावरण को क्षय, प्राकृतिक संसाधनों की कमी और मनुष्य जीवन को खतरे का हवाला देकर दीपावली पर पटाखों के धुएं, होली पर पानी की बर्बादी, जन्माष्टमी पर दही-हांडी प्रतियोगिता, गणेश चतुर्थी और दुर्गा पूजा पर मूर्ति विसर्जन आदि परंपराओं से एकाएक व्यथित हो उठता है। इन सभी त्यौहारों को ‘‘ईको-फ्रैंडली’’ से मनाने पर बल देने के साथ-साथ अदालत की चौखट तक भी पहुंच जाता है। यही नहीं, इसी वर्ष जनवरी माह में दिल्ली की केजरीवाल सरकार में मंत्री इमरान हुसैन प्रदूषण रोकने के लिए हिन्दुओं के अंतिम संस्कार में लकडिय़ों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा कर चुके हैं। 

पर्यावरण की रक्षा एक सामूहिक जिम्मेदारी है, जिसमें विश्व के सभी देशों और उसमें निहित वर्गों का सहयोग व बलिदान आवश्यक है, किन्तु क्या भारत जैसे विशाल देश में प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों पर केवल हिन्दुओं के रीति-रिवाज और पर्व ही प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं? क्या अन्य मजहबों की परम्पराएं और जीवनशैली पर्यावरण के अनुकूल है? वर्ष 2014-15 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम अर्थात यू.एन.ई.पी. की रिपोर्ट में बीफ (गौमांस) को पर्यावरणीय रूप से सबसे हानिकारक मांस बताया गया है। रोम स्थित संस्था खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार, मांस विशेषकर बीफ का सेवन करना वैश्विक पर्यावरण के लिए सबसे अधिक खतरनाक है। औसतन एक साधारण बीफ. बर्गर के कारण पर्यावरण में 3 किलो विषैली गैस कार्बन का उत्सर्जन होता है। 

यू.एन.ई.पी. ने एक स्वीडिश अध्ययन का उपयोग करते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा है, ‘‘ग्रीनहाऊस गैस उत्सर्जन के मामले में घर में 1 किलो बीफ  का सेवन 160 किलोमीटर तक किसी मोटरवाहन का इस्तेमाल करने के समान है।’’ इसका अर्थ यह है कि दिल्ली से अलवर जाने वाले वाहन से उतना ही कार्बन उत्सर्जन होगा, जितना कि 1 किलो बीफ  के सेवन से। विशेषज्ञों का सुझाव है कि बीफ का सेवन छोडऩे से पृथ्वी पर  वैश्विक ‘‘कार्बन फुटप्रिंट’’ कम होगा। यह कमी वाहनों का उपयोग छोडऩे से कार्बन अंश में आने वाली कमी से कहीं अधिक होगी। अर्थात खतरनाक गैसों के उत्सर्जन के माध्यम से ग्लोबल वाॄमग में जितना योगदान वाहनों का है, उससे कहीं अधिक बीफ  उत्पाद का है। 

अब यदि तथाकथित पर्यावरण रक्षक दीवाली पर वायु प्रदूषण बढऩे की आशंका के कारण पटाखों पर प्रतिबंध की मांग करते हैं तो वही लोग भारत में बीफ (गौमांस) का सेवन छोडऩे के लिए अभियान क्यों नहीं चलाते? इस्लामी पर्व ईद-उल-अजहा के अवसर पर पशुओं (गौवंश, बकरे, ऊंट)  की कुर्बानी और उसके मांस के सेवन की परंपरा है। ईसाई मत में भी बीफ  आदि मांस का सेवन किया जाता है। यक्ष प्रश्न है कि जो बीफ  जलवायु के लिए इतना घातक है, क्या आज तक उस पर कोई प्रतिबंध लगा? देश में जब भी संस्कृति व आस्था के आधार पर गौवंश की हत्या और उसके मांस के उपभोग पर प्रतिबंध की मांग की जाती है तो उसे व्यक्ति के पसंदीदा भोजन करने के अधिकार पर कुठाराघात बताकर उसे तुच्छ और सांप्रदायिक मानसिकता से प्रेरित कहा जाता है। अब यदि इसी तर्क को आधार बनाया जाए तो क्या दीपावली पर इस तरह के व्यवधान को आस्था के मूलभूत अधिकारों पर चोट नहीं माना जाएगा? 

भारत सहित विश्व में ऊर्जा और विद्युत की प्रचंड खपत भी तापमान बढऩे और भू-मंडलीय ऊष्मीकरण का कारण है। ऐसे में पर्यावरण के स्वयंभू संरक्षक देश में क्रिसमस और नववर्ष के अवसरों पर घरों, दुकानों और मॉल्स को बड़े-बड़े विद्युत उपकरणों के माध्यम से रोशनी से जगमग करने की परंपराओं के खिलाफ  मुहिम क्यों नहीं चलाते? देश में इस विकृति का मुख्य कारण वे नीतियां और विमर्श हैं, जिन्हें सैकुलरवाद के नाम पर स्वतंत्र भारत में गत 70 वर्षों से प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिसका आधार ही बहुसंख्यक हितों व अधिकारों को सांप्रदायिक घोषित कर देश विरोधी और कट्टर मजहबी मानसिकता का पोषण है।

1950 के दशक में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू की सरकार द्वारा संसद में हिन्दू कोड बिल को बहुमत के आधार पर पारित करवाना, इसका बड़ा उदाहरण है। पर्यावरण की रक्षा मानवता के हित में है और हिन्दुत्व दर्शन ही प्रकृति संरक्षण का एक आदर्श प्रतिरूप है। आवश्यकता इस बात की है कि सभी शोधों की पृष्ठभूमि में समग्र त्यौहारों की समीक्षा की जाए। जब तक एक विशेष समुदाय के पर्वों को निशाना बनाकर निर्णय लिए जाएंगे, तब तक समाज में इस तरह के प्रश्न खड़े होते रहेंगे। 

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