देश के सामने 1991 जैसा आर्थिक संक्ट नही है: बसु

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Monday, August 19, 2013-3:32 PM

वाशिंगटन: विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसु ने भारतीय अर्थव्यवस्था के मौजूदा हालात पर कहा है कि लगातर कमजोर होते रुपए और बढते चालू खाता घाटे के बावजूद विदेशी भुगतान संतुलन का संकट 1991 जैसा नहीं है। वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके बसु ने अपने बयान के समर्थन में कई वित्तीय आंकडों का हवाला देते हुए कहा कि अर्थव्यवस्था की स्थिति 1991 से अभी भी काफी बेहतर है।

 

इसलिए इसे लेकर ज्यादा चिंतित होने की आवश्यकता नहीं हैं। बसु का यह बयान ऐसे समय आया है जब रुपया आज डॉलर की तुलना में शुक्रवार की अपनी रिकार्ड गिरावट 62.03 रुपए प्रति डॉलर से और अधिक कमजोर होकर बीच सत्र में एक समय 62.65 रुपए प्रति डॉलर तक फसिल गया। रुपए की इस हालात पर उन्होंने कहा कि इसे मजबूती देने के लिए सरकार को विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करना चाहिए। वर्ष 1991 में देश में विदेशी भुगतान के लिए महज 15 दिन की विदेशी मुद्रा बची थी।

 

उस हालात में सरकार को विदेशी मुद्रा हासिल करने के लिए सोना गिरवी रखना पडा था और ऐसे आर्थिक सुधारों को अपनाने के लिए विवश होना पडा था जो देश को वैश्विकरण की राह पर आगे ले गए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कह चुके हैं कि देश के समक्ष वर्ष 1991 जैसे भुगतान संकट की स्थिति नही है और देश के पास छह से सात महीने तक की जरूरतों के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा का भंडार है।

 

अर्थशास्त्रियों और सरकार के इन तमाम आश्वासनों के बावजूद हालात कुछ और ही हकीकत बयान कर रहे हैं। घरेलू मुद्रा लगातार कमजोर हो रही है जिससे मंहगाई बढ रही है। शेयर बाजार दम तोड रहे हैं। विदेशी निवेशकों का भरोसा अर्थव्यवस्था पर डगमगा रहा है।
 

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