वसीयत न होने पर एेसे बांटी जा सकती है प्रॉपर्टी, नहीं होगा कोई विवाद

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Saturday, October 21, 2017-1:14 PM

नई दिल्लीः हमारे देश में आज भी कम ही लोग अपनी वसीयत बनवाते हैं ताकि उनके निधन के बाद उत्तराधिकार को लेकर किसी तरह का कानूनी विवाद न हो तथा उनके उत्तराधिकारी को भी किसी तरह के विवादों में फंसना न पड़े। आंकड़ों के अनुसार, भारत में 2 प्रतिशत लोग भी वसीयत नहीं बनवाते हैं। केवल अत्यधिक धनाढ्य ही वसीयत बनवाते हैं, क्योंकि उनके विशाल बिजनैस से कई लोग जुड़े हो सकते हैं।  वसीयत न होने पर सम्पत्ति किसकी होगी यदि किसी व्यक्ति का निधन वसीयत किए बिना होता है, तो उत्तराधिकार कानून में तय नियमों के अनुसार उसके पारिवारिक सदस्यों के मध्य उसकी सम्पत्तियों का विभाजन होता है।

-हिन्दू, सिख, जैन या बौद्ध होने पर
यदि व्यक्ति हिन्दू, सिख, जैन या बौद्ध व्यक्ति है, तो उनकी सम्पत्तियों का विभाजन उनके उत्तराधिकारियों के बीच हिन्दू उत्तराधिकार कानून 1956 के तहत होता है।

-क्लास वन उत्तराधिकारी
इस कानून के तहत क्लास वन उत्तराधिकारियों को अन्य उत्तराधिकारियों के मुकाबले प्राथमिकता मिलती है। क्लास वन उत्तराधिकारियों में बेटा, बेटी, विधवा मां, दिवंगत बेटे या बेटी के बेटे या बेटी, विधवा बहू, दिवंगत बेटे के दिवंगत बेटे या बेटी का बेटा, दिवंगत बेटे की विधवा बहू शामिल हैं। वर्ष 2005 में संशोधन के बाद इस सूची में और परिजन जोड़े गए हैं जिसमें दिवंगत बेटी की दिवंगत बेटी का बेटा या बेटी, दिवंगत बेटी के दिवंगत बेटे का बेटा, दिवंगत बेटी की दिवंगत बेटी की बेटी शामिल हैंं।

-क्लास टू उत्तराधिकारी
इनमें 9 श्रेणियां हैं। पिता को श्रेणी एक में रखा गया है जबकि भाई-बहन, पोती का बेटा या बेटी दूसरी श्रेणी में हैं। क्लास दो की तीसरी श्रेणी में नातिन या नाती का बेटा या बेटी आते हैं। गौरतलब है कि क्लास टू की दूसरी तथा तीसरी श्रेणी के 4 उत्तराधिकारी क्लास वन में शामिल हैं। पिता और पोती या नाती के बेटे को क्लास वन में रखा गया है।

-गोद ली संतान मान्य परंतु सौतेली नहीं
इस कानून के तहत भाई और बहन का मतलब विधि सम्मत भाई-बहन है। इसमें गोद ली गई संतानें भी शामिल हैं लेकिन सौतेली नहीं। मरने वाले की मौत के बाद पैदा होने वाली संतान भी विधि संवत मानी जाएगी। बेटी का विवाहित होना या न होना उसके अधिकार में कोई अंतर पैदा नहीं करेगा।

-महिला की वसीयत न होने पर
हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 के तहत यदि किसी महिला की मौत अपनी वसीयत किए बिना हो जाती है, तो उसकी सम्पत्ति के बंटवारे का प्रावधान है। 
इस महिला की सम्पत्ति सबसे पहले बेटे, बेटी और पति में बंटेगी। इनमें उसके दिवंगत बेटे या बेटी की संतानों को भी शामिल किया जाएगा। दूसरे स्थान पर यह बंटवारा पति के उत्तराधिकारियों के बीच होगा। तीसरे स्थान पर महिला के माता-पिता आएंगे। चौथे स्थान पर उसके पिता के उत्तराधिकारी होंगे। अंत में उसकी मां के उत्तराधिकारी होंगे।
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-महिला को विरासत में मिली सम्पत्ति पर उत्तराधिकार
अगर महिला को यह सम्पत्ति पति या ससुर से विरासत में मिली है, तो महिला की कोई संतान या दिवंगत संतान के बेटे-बेटी न होने पर सम्पत्ति उसके पति के उत्तराधिकारियों के बीच बंटेगी। सम्पत्ति के विरासत में मिलने से मतलब है कि यह सम्पत्ति उस महिला को बिना वसीयत के किसी उत्तराधिकार में मिली हो, न कि किसी वसीयत अथवा उपहार में मिली हो।

-समान विभाजन
सम्पत्ति विभाजन के मामलों में कानून के तहत बच्चों में भेदभाव नहीं किया जाता है। जैसे कि ऐसा नहीं हो सकता कि फिक्स्ड डिपॉजिट बड़ी बेटी की शिक्षा के लिए दे दिया जाए और कार को उसका ज्यादा प्रयोग करने वाले छोटे बेटे को दे दिया जाए। वसीयत न होने पर सम्पत्तियों को का समान विभाजन होगा। जहां विभाजन सम्भव न हो जैसे कि कार तो उसे बेच कर मिलने वाली रकम को समान रूप से सभी वारिसों को दिया जाएगा। 

-मुस्लिम होने पर 
यदि किसी मुस्लिम व्यक्ति का निधन वसीयत के बिना होता है, तो उसके उत्तराधिकारियों का फैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर होगा। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह मुस्लिम धर्म के किस वर्ग से संबंधित है। इस्लाम में व्यक्ति अपनी कुल सम्पत्ति में से केवल एक-तिहाई की वसीयत कर सकता है। बाकी की दो-तिहाई सम्पत्ति को अनिवार्य रूप से वैध वारिसों में विभाजित करना होता है। शरिया कानून के अनुसार, यह विभाजन इस बात पर निर्भर करता है कि वह ‘बोहरी, मैमन, शिया या सुन्नी’ में से किस वर्ग से संबंधित है।

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