'19 साल बाद विशिष्ट जन्माष्टमी'

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Wednesday, August 28, 2013-12:27 PM

चंडीगढ़: 2013 का वर्ष अद्भुत संयोगों वाला साल है, जिसमें अभूतपूर्व संयोग, घटनाएं, पर्वों की विशिष्टता, मुख्य रूप से झलक रही हैं। इस बार, राखी का पर्व भी 40 साल बाद 2 दिन मनाया गया।  भगवान श्रीकृष्ण के भक्तों के लिए जन्माष्टमी का पर्व इस बार विशेष फलदायी बनकर आया है। ये बताया जा रहा है कि ये योग 27 वर्ष बाद नक्षत्र, गृह और दिन का विशेष योग बना है जिसमें भगवान का जन्म होगा। इस साल 28 अगस्त को पंचांग के सभी तत्वों का दुर्लभ संयोग फिर बन रहा है, जब भादों के कृष्ण पक्ष पर अद्र्धरात्रि पर अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, वृष राशि का चंद्र और बुधवार का समन्वय होगा।

इससे पूर्व 1865 में भी ऐसा ही योग था जो कृष्ण जी के जन्मकालीन ग्रह योगों से मिलता था। द्वापर काल में इन्हीं विशिष्ट संयोगों में भगवान कृष्ण का जन्म, कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। 28 तारीख को राहु व शनि की युति तुला राशि में विशेष ज्योतिषीय भविष्यवाणी परिलक्षित कर रही है। भगवान कृष्ण के जन्म के बाद भारत में एक शासकीय परिवर्तन आया था और वर्तमान में भी राहु-शनि की युगलबंदी कुछ नए गुल खिलाएगी।

व्रत कब और कैसे रखा जाए?

व्रत के विषय में इस बार किसी प्रकार भी भ्रांति नहीं हैं। फिर भी कई लोग, अद्र्धरात्रि पर रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी और अष्टमी पर व्रत रखते हैं। कुछ भक्तगण उदयव्यापिनी अष्टमी पर उपवास करते हैं।

शास्त्रकारों ने व्रत-पूजन, जपादि हेतु अद्र्घरात्रि में रहने वाली तिथि को ही मान्यता दी। विशेषकर स्मार्त लोग अद्र्धरात्रिव्यापिनी अष्टमी को यह व्रत करते हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, चंडीगढ़ आदि में स्मार्त धर्मावलंबी अर्थात गृहस्थ लोग गत हजारों सालों से इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए सप्तमी युक्ता अद्र्धरात्रिकालीन वाली अष्टमी को व्रत, पूजा आदि करते आ रहे हैं, जबकि मथुरा, वृंंदावन सहित उत्तर प्रदेश आदि प्रदेशों में उदयकालीन अष्टमी के दिन ही कृष्ण जन्मोत्सव मनाते आ रहे हैं। भगवान कृष्ण की जन्मसथली मथुरा की परंपरा को आधार मानकर मनाई जाने वाली जन्माष्टमी के दिन ही केंद्रीय सरकार अवकाश की घोषणा करती है।

वैष्णव सम्प्रदाय के अधिकांश लोग उदयकालिक नवमी युता जन्माष्टमी व्रत हेतु ग्रहण करते हैं। सपाटू के अनुसार 28 तारीख बुधवार की सुबह स्नान के बाद, व्रतानुष्ठान करके ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र जाप करें। पूरे दिन व्रत रखें। फलाहार कर सकते हैं। रात्रि के समय ठीक 12 बजे, लगभग अभिजित मुहूर्त में भगवान की आरती करें। प्रतीक स्वरूप खीरा फोड़ कर, शंख ध्वनि से  जन्मोत्सव मनाएं। चंद्रमा को अघ्र्य देकर नमस्कार करें। तत्पश्चात मक्खन, मिश्री, धनिया, केले, मिष्ठान आदि का प्रसाद ग्रहण करें और बांटें। अगले दिन नवमी पर नन्दोत्सव मनाएं। उन्होंने कहा कि इस दिन जयंती योग भी है अत: संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्ति, संतान गोपाल मंत्र का जाप पति-पत्नी दोनों मिल कर करें, अवश्य लाभ होगा।

मंत्र है
देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते!
देहिमे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:!!
विवाह विलंब के लिए मंत्र है-
ओम् क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्ल्भाय स्वाहा।
इन मंत्रों की एक माला अर्थात 108 मंत्र कर सकते हैं।


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