आंतरिक खुशी का एहसास करना हो तो करें ये कार्य, नहीं करेगी असफलता परेशान

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Tuesday, September 20, 2016-12:50 PM

लोगों को अवसाद में घिरकर जीवन समाप्त करते देखना इन दिनों आम हो गया है। व्यक्तिगत कारण हों या ऑफिस से ज्यादा अपेक्षाएं पाल लेना, ऐसी घटनाओं का केंद्र-बिंदु यही होता है कि हम वास्तविकता की अनदेखी कर देते हैं। एक कंपनी के सी.ई.ओ. की बड़ी इच्छा थी कि उनका बेटा फायनांस की पढ़ाई कर उनका बिजनैस संभाले। किंतु उनकी अपेक्षा के विपरीत बेटे ने स्पोर्ट्स में अपना करियर बना लिया और पिता इसी निर्णय के सदमे से घोर अवसाद में चले गए।

 

निराशा या क्रोध हमें तभी घेरते हैं, जब दूसरे व्यक्ति से तथाकथित अपेक्षित उत्तर नहीं मिल पाता। सच पूछा जाए तो हमारी खुशियां अपेक्षाओं की मोहताज हैं। बेटे का आशानुरूप रिजल्ट आया तो खुशियां दूनी, अन्यथा नहीं। समयानुकूल प्रमोशन मिला तो खुश, नहीं तो उदासी ही उदासी। असली और आंतरिक खुशी का एहसास करना हो तो अपनी अपेक्षाओं को नियंत्रण में रखना सीखें। तभी अपनी असफलताओं से दुख नहीं, बल्कि सीख मिलेगी।

 

वास्तव में हम अपना आकलन कर खुद को सीमाओं में बांध लेते हैं, पर दूसरों से हम हद से ज्यादा उम्मीद रखने लगते हैं। हालांकि दूसरा पहलू यह भी है कि उम्मीदें हमें कर्मपथ पर अग्रसर करती हैं। अपेक्षाएं मनोबल बढ़ाती हैं। विद्यार्थी अपने माता-पिता की आकांक्षाओं के अनुरूप ढलने में ऊर्जा के साथ-साथ प्रसन्न्ता का अनुभव करते हैं। कर्मचारी अपने मालिक की आकांक्षाओं के अनुरूप ढलकर देश की प्रगति में सहायक होते हैं। बस, इन अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए बहुत ज्यादा दबाव नहीं बनाना चाहिए। अपेक्षा किसी की योग्यता के विपरीत भी नहीं बनानी चाहिए। इसलिए जिससे उम्मीदें रखते हैं, उसकी योग्यता और कार्यक्षमता की पहचान कर लेनी चाहिए। किसी दूसरे के लिए लक्ष्य निर्धारित करना भी अनुचित है। किसी से सहयोग की आशा करना या अपनी उम्मीद के अनुसार दूसरों को ढालने से अच्छा है कि खुद को ही समर्थ बना लें। एक निश्चित लक्ष्य को धारण करते हुए अपेक्षाओं पर नियंत्रण रखकर संघर्षों का सहजता से सामना करें, उससे मिली सफलता या असफलता कभी विचलित नहीं करेगी।


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