ऐसे भाव से किया गया उपवास होता है फलित

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Sunday, October 02, 2016-4:38 PM

अष्टांग योग के पांच नियमों में से एक नियम है ‘तप’ अर्थात अपने शरीर को किसी रूप में स्वयं कष्ट देकर तपाना। यह एक बुनियादी शुद्धिकरण की प्रक्रिया है जोकि नकारात्मक कर्मों को काटने, हटाने में तथा आत्मिक उत्थान में सहायक होती है। उपवास भी स्वयं को तपाने का एक माध्यम है। यही कारण है कि शारीरिक तथा आत्मिक शुद्धि के लिए नवरात्रों के दौरान उपवास रखे जाते हैं। मां ‘शक्ति’ के दस रूप- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रकान्ता, कुशमंदा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री तथा अपराजिता, इन नौ रातों और दस दिनों में समाए हुए हैं। इस प्रकार प्रत्येक रात्रि की एक विशेष शक्ति है जिसका एक विशिष्ट प्रयोजन है। 

 

नवरात्रों के दौरान मौसम परिवर्तित होता है अर्थात इस सृष्टि की विभिन्न शक्तियां असंतुलन से एक सामान्य स्थिति की ओर बढ़ती हैं। चूंकि हम इस सृष्टि के पूर्ण अंश हैं, हम भी इन नौ दिनों में एक संतुलन में आने लगते हैं। इस दौरान हमारी प्राण शक्ति एक पुनः निर्माण की प्रक्रिया से होकर गुजरती है जिसके लिए शरीर को हल्का रखा जाता है। शरीर के सम्पूर्ण विषहरण के लिए, इन दिनों में उपवास के अलावा कुछ विशेष मन्त्रों का जाप भी किया जाता है।

 

नौ दिनों तक आप अपने शरीर को फिर से संगठित करते हैं और उसके बाद दसवें दिन एक नई ऊर्जा, नई शक्ति को ग्रहण करते हैं। ‘गुरु’ एक शिष्य की क्षमता व आवश्यकता अनुसार उपवास व मन्त्र साधना निर्धारित करते हैं। निगरानी बिना किया गया उपवास या फिर भूखा रहकर वजन घटाने के लिए किए गए उपवास का शरीर पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जो कि असंतुलन की ओर ले जाता है। किसी भी उपवास या साधना का परिणाम तभी सही रूप में फलित होता है जब वह एक वैराग्य भाव से किया जाता है इसलिए यह सब करने से पूर्व, अष्टांग योग व सनातन क्रिया के सही अभ्यास द्वारा अपने भीतर उस तरह का वैराग्य लाना अति आवश्यक है।
              
योगी अश्विनीजी 
www.dhyanfoundation.com

 


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