जीवन में न करें ऐसे कार्य, खुलते हैं नरक के द्वार

  • जीवन में न करें ऐसे कार्य, खुलते हैं नरक के द्वार
You Are HereDharm
Sunday, October 16, 2016-1:34 PM

वेद सृष्टि का असीम ज्ञान हैं। इनमें निहित तथ्य उतने ही वैज्ञानिक और तार्किक हैं जितने वे प्राचीन और पारंपरिक हैं। वैदिक संस्कृति में समाज को सम्प्रदाय, क्षेत्र, जन्म, रंग-रूप अथवा प्रतिष्ठा के बल पर विभाजित नहीं किया जाता था, ये सभी आधुनिक संकल्पनाएं हैं। अलग-अलग  वैदिक ऋषियों ने मानव जाति का दैविक (सभ्य)  और आसुरिक (असभ्य) प्रवृत्तियों में वर्गीकरण किया और ये वर्ग सभी संस्कृतियों और सम्प्रदायों में उपस्थित है। यहां तक कि एक ही जीव में अलग-अलग समय और स्थिति में ये दोनों ही प्रवृत्तियां देखने को मिलती हैं। 

 

द्वौ भूतसर्गो लोकेअस्मिन्दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरम पार्थ मे शृणु ॥ भगवद गीता १६.६  ॥ 

 

भगवान् कृष्ण असुरों के गुणों का अवलोकन करते हुए कहते हैं कि संसार में दो ही प्रकार के जन होते हैं- पहले वे जिनकी प्रवृत्ति दैविक है और दूसरे वे जिनमें आसुरिक प्रवृत्ति प्रबल होती है। 

 

आसुरिक प्रवृत्ति के लोगों में विवेक शक्ति, सदाचार और सत्य का अभाव होता है । उनकी विचारधारा विनाशकारी होती है। अन्य जीव जंतुओं को कष्ट व पीड़ा पहुंचाना, किसी पर अन्याय होते देख मुंह फेर लेना ये असुरों के ही लक्षण हैं। ऐसे लोग स्वयं के लिए जीते हैं तथा पाखंड, घमंड व अक्खड़पन से युक्त होते हैं। सुबह शाम इन्द्रियों के धभोगों का सेवन करने वाले ये असुरजन स्थूल को ही अंतिम सत्य मान बैठते हैं। वे अधिक से अधिक धन अर्जित करने के नित नए उपाय करते हुए अपना संपूर्ण जीवन धन संशय में ही निकाल देते हैं। ऐसे जन दान और सेवा कार्य भी मात्र दिखावे के लिए ही करते हैं। गीता के अनुसार, ऐसे मनुष्य पतन चक्र में फंसकर, कष्टदायी जन्मों और नरकों की ओर प्रस्थान करते हैं । 

 

यदि आप अपने आस-पास हो रहे मानव व पशु शोषण, लूट-मार और धोखाधड़ी पर नज़र डालेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि आधुनिक काल के मानवों पर आसुरिक वृत्ति हावी है। अध्यामत्मिकता के नाम पर नाच-गाना और नाश करना भी असुरों के ही लक्षण हैं। जिस प्रकार मंदिर में बैठ कर किया जाने वाला पाप, पुण्य नहीं बन जाता, उसी प्रकार सत्संग में उद्दंडता के प्रदर्शन करने से वह दैविक नहीं हो जाती। नाच-गाना और मौज मनाने में कोई बुराई नहीं है यदि उसके साथ-साथ जन-कल्याण के लिए दान-पुण्य के कार्य भी उतनी ही तीव्रता से किए जाएं। जो लोग सृष्टि के कल्याण के कार्यों में सलग्न रहते हैं वे सुख-समृद्धि प्राप्त करते हैं और जो लोग सृष्टि के नाश में भागीदार बनते हैं,  स्वयं के लिए नरक के द्वार खोल लेा है। सभी धर्म कर्म की नीति का समर्थन करते हैं। इस नीति का प्रयोग सद्कर्मों द्वारा अपने हित के लिए कीजिए। 
योगी अश्विनी 
www.dhyanfoundation.com

यहाँ आप निःशुल्क रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं, भारत मॅट्रिमोनी के लिए!

Recommended For You