रक्षाबंधन पर लें पावन प्रतिज्ञा

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Wednesday, August 21, 2013-7:15 AM

रक्षाबंधन का पावन पर्व भाई-बहन के बीच मन, वचन, कर्म की पवित्रता का बोधक है परंतु आज यह केवल शारीरिक सुरक्षा का प्रतीक बन कर रह गया है। आज हम इस त्यौहार को एक रस्म के रूप में मना रहे हैं जबकि इस त्यौहार का गहरा संबंध समस्त मानव जाति से है।

यूं तो कोई भी बंधन किसी को अच्छा नहीं लगता लेकिन राखी के इस बंधन में हर व्यक्ति स्वैच्छा से खुशी-खुशी से बंधना चाहता है। जब सभी नर-नारी काम, क्रोध आदि महाशत्रुओं के शिकंजे में जकड़े हुए तड़प रहे होते हैं तब इन विकारों से हम सबकी रक्षा हेतु, कल्याणकारी, ज्ञानसागर, परमपिता परमात्मा सभी मनुष्यत्माओं को मन, वचन, कर्म की पवित्रता की दृढ़ प्रतिज्ञा का कंगन बांधकर ‘पवित्र बनो’, ‘योगी बनो’ का दिव्य संदेश देते हैं।

राखी बनी तो कुछ धागों की होती है, परंतु इन धागों में भरा भाव जीवन को बहुत ऊंचा बनाने वाला है। पवित्रता की धारणा के बल से मानव के लिए यह अमूल्य उपहार है। वास्तव में यह इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने के संकल्प का प्रतीक है। मनुष्य ईश्वरीय स्नेह के सूत्र में बंधकर अर्थात ईश्वरीय नियम-मर्यादाओं का पालन कर पांच विकारों पर विजय प्राप्त कर सकता है और अपनी खोई हुई विरासत- सुख, शांति, आनंद, प्रेम, शक्ति, पवित्रता के बल से नई सतयुगी दुनिया की फिर से स्थापना कर सकता है इसलिए इस त्यौहार को विष-तोड़क पर्व के रूप में भी मनाते हैं।

यदि भाई को राखी बांधते हुए हर बहन प्रतिज्ञा कराए कि जैसे वह उसे बहन की दृष्टि से देखता है वैसे ही अन्य नारियों को भी पवित्र दृष्टि-वृति से देखेगा और मन में पवित्रता धारण करेगा तो भला किसी भी बहन की लाज खतरे में कैसे पड़ेगी? मुख मीठा कराते समय सभी के साथ मीठा बोलने की दृढ़ प्रतिज्ञा लें। यदि आज हम इस सत्यता को हृदय से स्वीकार कर लें तो देश का चारित्रिक पतन, का सहज समाधान हो सकता है।

  —बी.के. राज (प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, 407, आदर्श नगर, जालंधर)

 


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