84 कोस की यात्रा से 84 लाख योनियों से निजात मिलती है

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Saturday, August 24, 2013-10:32 AM
सनातन धर्म में समस्त तीर्थों के ईद-र्गिद चौरासी और पंच कोस की परिक्रमा करने का विधान है। धर्म और आस्था के इस संगम की प्रत्येक तीर्थ क्षेत्र में अलग-अलग महत्व और परंपरा है। शास्त्रों में कहा गया है कि परिक्रमा के करने वालों को एक-एक कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल व निश्चित ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।

विद्वानो, संतों व महात्माओं के इन यात्राओं को लेकर विभिन्न मत हैं। इसलिए इन यात्राओं का कोई निश्चित समय नहीं है। अधिकतर यात्राएं चैत्र, बैसाख, चतुर्मास, पुरुषोत्तम मास में होती हैं। वार्षिक यात्रा चैत्र पूर्णिमा से बैसाख पूर्णिमा तक निकाली जाती है। आश्विन माह में विजया दशमी के पश्चात शरद् काल में परिक्रमा करने का भी विधान है। इन यात्राओं को करने से मन को अभूतपूर्व सुख-शांति व आनन्द की प्राप्ति होती है इसीलिए असंख्य रसिक भक्त जनों ने परम पावन अलौकिक साक्षात्कार करके अपना जीवन धन्य किया है।

मान्यता है कि 84 कोस की यात्रा करने वाले जातक को 84 लाख योनियों से निजात मिलती है। परिक्रमा करने वाले 84 कोस की दूरी पैदल, बस, ट्रैक्टर-ट्रॉली तथा अन्य साधनों से तय करते हैं। चौरासी कोस की परिक्रमा विशेष समय और स्थान पर पूर्ण रूप से संतों और भक्तों द्वारा संचालित धार्मिक व परम्परागत है। इस परिक्रमा को ब्रज क्षेत्र में गोवर्धन, अयोध्या में सरयू, चित्रकूट में कामदगिरि, दक्षिण भारत में तिरुवन्मलई और उज्जैन में चौरासी महादेव की यात्रा का आयोजन किया जाता है।

परिक्रमा के दौरान तीर्थयात्री भजन गाते, संकीर्तन करते और प्रमुख मंदिरों व दर्शनीय स्थलों के दर्शन करते हुए बड़ी श्रद्धा के साथ परिक्रमा करते हैं। इन यात्राओं का सामाजिक महत्व भी है। देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए हजारों तीर्थ यात्री जाति, भाषा और प्रान्त की सीमाओं को लांघ कर प्रेम, सौहा‌द्र्र, श्रद्धा, विश्वास, प्रभु भक्ति और भावनात्मक एकता आदि अनेक सद्गुणों के जीवन्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

शास्त्रों के मतानुसार अयोध्या के भगवान राम का राज्य 84 कोस (252‍ किलोमीटर) में फैला हुआ था। उनके राज्य का नाम था कौशलपुर जिसकी राजधानी अयोध्या थी। इस स्थान पर दशकों से 84 कोसी परिक्रमा की परंपरा है। इस यात्रा के दायरे में आने वाले सभी छह जिलों बाराबंकी,गोंडा, बहराइच, आंबेडकर नगर, फैजाबाद और बस्ती में इसकी तैयारी होती है। उक्त जिलों में यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव होते हैं जहां रुककर यात्री आराम करते हैं।

इस परिक्रमा को करने के चाहवान जातकों के लिए 36 नियम हैं जिसका पालन अनिवार्य है जैसे- धरती पर सोना, नित्य स्नान, ब्रह्मचर्य पालन, जूते-चप्पल का त्याग, नित्य देव पूजा, कथा-संकीर्तन, फलाहार, क्रोध, मिथ्या, लोभ, मोह व अन्य दुर्गुणों का त्याग, सत्य बोलना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, तीर्थों में स्नान करना, आचमन करना,भगवत निवेदित प्रसाद का सेवन, तुलसी माला पर हरिनाम कीर्तन या वैष्णवों के साथ हरिनाम संकीर्तन करना चाहिए। परिक्रमा करते वक्त ब्राह्मण, श्रीमूर्ति, तीर्थ और भगवद्लीला स्थलियों का विधानपूर्वक सम्मान एवं पूजा करते हुए परिक्रमा करना।

परिक्रमा के रास्ते में आने वाले वृक्ष, लता, गुल्म, गो आदि को छेडऩा नहीं चाहिए, साधु-संतों आदि का अपमान न करें, साबुन, तेल और क्षौर कार्य का वर्जन करना, चींटी, जीव-हिंसा इत्यादि से बचना, परनिन्दा पर चर्चा न करना और कलेश से सदा बच कर रहना।


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