श्री कृष्ण जन्मस्थान के प्रथम स्मृति-मन्दिर का पुनीत कार्य कैसे आरम्भ हुआ?

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Tuesday, August 27, 2013-7:41 AM

उपेक्षित अवस्था में पड़े रहने के कारण उसकी दशा अत्यन्त दयनीय थी। कटरा के पूरब की ओर का भाग सन् 1885 के लगभग तोड़कर वृन्दावन रेलवे लाइन निकाली जा चुकी थी। बाकी तीन ओर के परकोटा की दीवारें और उससे लगी हुई कोठरियां जगह-जगह गिर गयी थी और उनका मलबा सब ओर फैला पड़ा था।

कृष्ण चबूतरा का खण्डहर भी विध्वंस किये हुए मन्दिर की महानता के द्योतक के रूप में खड़ा था। चबूतरा पूर्व-पश्चिम लम्बाई में 170 फीट और उत्तर-दक्षिण चौड़ाई में 66 फीट है। इसके तीनों ओर 16-16 फीट चौड़ा पुश्ता था जिसे सिकन्दर लोदी से पहले कुर्सी की सीध में राजा वीर सिंह देव ने बढ़ाकर परिक्रमा पथ का काम देने के लिये बनवाया था।

यह पुश्ता भी खण्डहर हो चुका था। इससे करीब दस फीट नीची गुप्त कालीन मन्दिर की कुर्सी है जिसके किनारों पर पानी से अंकित पत्थर लगे हुए हैं। उत्तर की ओर एक बहुत बड़ा गढ्डा था जो पोखर के रूप में था। समस्त भूमि का दुरूपयोग होता था, मस्जिद के आस-पास घोसियों की बसावट थी जो कि आरम्भ से ही विरोध करते रहे हैं।

अदालत दीवानी, फौजदारी, माल, कस्टोडियन व हाईकोर्ट सभी न्यायालयों में एवं नगरपालिका में उनके चलायें हुए मुकदमों में अपने सत्व एवं अधिकारों की पुष्टि व रक्षा के लिए बहुत कुछ व्यय व परिश्रम करना पड़ा। सभी मुकदमों के निर्णय जन्मभूमि-ट्रस्ट के पक्ष में हुए। मथुरा के प्रसिद्ध वेदपाठी ब्राह्मणों द्वारा हवन-पूजन के पश्चात श्री स्वामी अखंडानन्द जी महाराज ने सर्वप्रथम श्रमदान का श्रीगणेश किया और भूमि की स्वच्छता का पुनीत कार्य आरम्भ हुआ।

दो वर्ष तक नगर के कुछ स्थानीय युवकों ने अत्यन्त प्रेम और उत्साह से श्रमदान द्वारा उत्तर ओर के ऊंचे-ऊंचे टीलों को खोदकर बड़े गड्डे को भर दिया और बहुत सी भूमि समतल कर दी। कुछ विद्यालयों के छात्रो ने भी सहयोग दिया। इन्हीं दिनों उत्तर ओर की प्राचीर की टूटी हुई दीवार भी श्री डालमियां जी के दस हजार रुपये के सहयोग से बनवा दी गयी।

भूमि के कुछ भाग के स्वच्छ और समतल हो जाने पर भगवान कृष्ण के दर्शन एवं पूजन-अर्चन के लिए एक सुन्दर मन्दिर का निर्माण डालमिया-जैन ट्रस्ट के दान से सेठ श्री रामकृष्ण जी डालमिया की स्वर्गीया पूज्या माता जी की पुण्यस्मृति में किया गया। मन्दिर में भगवान के बल-विग्रह की स्थापना, जिसको श्री जुगल किशोर बिड़ला जी ने भेंट किया था, आषाढ़ शुक्ला द्वितीय सम्वत् 2014 ता0 29 जून सन् 1957 को हुई, और इसका उदघाटन भाद्रपद कृष्ण 8 सम्वत् 2015 ता0 6 सितंबर सन् 1958 को 'कल्याण' (गीता प्रेस) के यशस्वी सम्पादक संतप्रवर श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार के कर-कमलों द्वारा हुआ। यह मन्दिर श्री केशव देव मन्दिर के नाम से प्रख्यात है।

कटरा केशवदेव स्थित श्रीकृष्ण चबूतरा ही भगवान श्री कृष्ण की दिव्य प्राकट्य-स्थली कहा जाता है। मथुरा-म्यूजियम के क्यूरेटर डा वासुदेवशरण जी अग्रवाल ने अपने लेख में ऐतिहासिक तथ्य देकर इस अभिमत को सिद्ध किया है। इससे सिद्ध होता है कि मथुरा के राजा कंस के जिस कारागार में वसुदेव देवकी नन्दन श्रीकृष्ण ने जन्म-ग्रहण किया था, वह कारागार आज कटरा केशवदेव के नाम से ही विख्यात है और 'इस कटरा केशवदेव के मध्य में स्थित चबूतरे के स्थान पर ही कंस का वह बन्दीगृह था, जहां अपनी बहन देवकी और अपने बहनोई वसुदेव को कंस ने कैद कर रखा था।

' श्रीमद्भागवत में इस स्थल पर श्रीकृष्ण-जन्म के समय का वर्णन इस प्रकार है-श्रीवज्रनाभ ने अपने प्रपितामह की इसी जन्मस्थली पर उनका प्रथम स्मृति-मन्दिर बनवाया था और इसी स्थल पर उसके पश्चात के मन्दिरों के गर्भ-गृह (जहां भगवान का अर्चाविग्रह विराजमान किया जाता है, उसको 'गर्भ-गृह कहते हैं।) भी निर्मित होते रहे।

पुरातन कला-कृतियों में मुख्य मन्दिर की पादपीठिका (प्लिंथ) अष्ठप्रहरी (अठपहलू) हुआ करती थी, जिसे ऊंची कुर्सी देकर बनाया जाता था इसीलिये अनेक मन्दिरों के ध्वंसावशेष और निर्माण के कारण यह स्थान 'श्रीकृष्ण-चत्वर' (चबूतरा) नाम ले प्रख्यात हुआ। इस स्थान पर ही श्री ओरछा नरेश द्वारा निर्मित मन्दिर का गर्भ-गृह रहा, जो औरंगजेब द्वारा ध्वस्त मन्दिर के मलवे में दब गया। उस मन्दिर के पूर्व दिशा वाले विशाल जगमोहन (दर्शक-गृह) के स्थान पर तो औंरगजेब ने एक ईदगाह खड़ी कर दी और पश्चिम में गर्भ-गृह अर्थात सम्पूर्ण श्री कृष्ण-चबूतरा बचा रहा।

श्री केशव देव जी का प्राचीन विग्रह ब्रज के अन्य विग्रहों की भांति आज भी सुरक्षित और पूजित है। औंरगजेब के शासनकाल में मुसलमानी फौजें मन्दिरों को ध्वस्त करने के लिए जब कूंच किया करती थीं, तब गुप्त रूप से हिन्दुओं को यह सूचना मिल जाती थी कि मन्दिर तोडऩे के लिए सेना आ रही है।

यह सूचना मिलते ही निष्ठावान भक्तजन मन्दिर-स्थित विग्रहों को हिन्दू राज्य एवं रजवाड़ो में ले जाते थे। इसी कारण श्री गोविन्ददेव जी का श्री विग्रह जयपुर में, श्री नाथ जी का श्री विग्रह नाथद्वारा (उदयपुर) में एवं री मदनमोहन जी का श्री विग्रह करौली में आज भी विराजमान है।

श्री कृष्ण-चबूतरे पर ओरछा नरेश वाले श्री विग्रह के सम्बन्ध में स्वर्गीय बाबा कृष्णदास द्वारा प्रकाशित 'ब्रजमण्डल-दर्शन' में उल्लेख है कि 'जहांगीर बादशाह के समय 1610 साल में ओरछा के राजा वीर सिंह देव ने 33 लाख रुपया लगाकर आदिकेशव का मन्दिर बनवाया था, जो कि 1669 साल में औंरगजेब के द्वारा ध्वस्त होकर मस्जिद के रूप में बन गया।

'जिस मन्दिर में आदि केशव विराजमान हैं, वह मन्दिर 1850 ई में ग्वालियर के कामदार के द्वारा निर्मित हुआ है। प्राचीन विग्रह अद्यापि राजधान ग्राम (जिला कानपुर में औरैया, इटावा से 17 मील) पर स्थित है। वहीं पास में 2 मील पर बुधौली ग्राम में श्री हरिदेव जी विराजते हैं।

प्राचीन केशव-मन्दिर के स्थान को 'केशव कटरा' कहते हैं। ईदगाह के तीन ओर की विशाल दीवारें ध्वस्त मन्दिर के पाषाण-खण्डों से बनी हुई हैं, जो ध्वंस किये गये प्राचीन मन्दिर की विशालता का मूक संदेश दे रही हैं। उपेक्षित रहने के कारण तीन शताब्दियों से भी अधिक समय तक यह स्थान मिट्टी-मलवे के टीलों में दब गया।

उसी मलवे के नीचे से, जहां भगवान का अर्चा-विग्रह विराजमान किया जाता था, वह गर्भ-गृह प्राप्त हुआ। उत्तरोत्तर श्रीकृष्ण-चबूतरे का विकास होता चला आ रहा है। श्री केशवदेव-मन्दिर के उपरान्त श्रीकृष्ण-चबूतरे के जीर्णोद्धार का कार्य सुप्रसिद्ध इंडियन एक्सप्रैस समाचार-पत्र-समूह-संचालक श्री रामनाथ जी गोयनका के उदार दान से उनकी धर्मपत्नी स्वर्गीय श्रीमती मूंगीबाई गोयनका की स्मृति में संवत 2019 में किया गया।

गर्भ-गृह की छत के ऊपर संगमरमर की एक छत्री और एक बरामदा बनवाया गया। गर्भ-गृह की छत के फर्श पर भी सम्पूर्ण संगमरमर जड़वाया गया। बड़े चमत्कार की बात है कि चबूतरे के ऊपर बरामदे की दीवार में लगी संगमरमर की शिलाओं पर श्री कृष्ण की विभिन्न मुद्राओं में आकृतियां उभर आयी हैं, जिन्हें देखकर दर्शकगण विभोर हो जाते हैं। शरद पूर्णिमा की पूर्ण चन्द्र-निशा में इस चबूतरे का दूध-जैसा धवल-सौन्दर्य देखते ही बनता है।

प्राचीन गर्भ-ग्रह की प्राप्ति जिस समय चबूतरे पर निर्मित बरामदे की नींव की खुदाई हो रही थी, उस समय श्रमिकों को हथौड़े से चोट मारने पर नीचे कुछ नरम जगह दिखाई दी। उसे जब तोड़ा गया तो सीढिय़ां और नीचे काफी बड़ा कमरा मिला, जो ओरछा-नरेश-निर्मित मन्दिर का गर्भ-गृह था। उसमें जिस स्थान पर मूर्ति विराजती थी, वह लाल पत्थर का सिंहासन ज्यों-का-त्यों मिला।

उसे यथावत रखा गया है तथा गर्भ-गृह की जर्जरित दीवारों की केवल मरम्मत कर दी गयी हैं। ऊपर चबूतरे पर से नीचे गर्भ-गृह में दर्शनार्थियों के आने के लिये सीढिय़ां बना दी गयी हैं। गर्भ-गृह के सिंहासन के ऊपर दर्शकों के लिये वसुदेव-देवकी सहित श्रीकृष्ण-जन्म की झांकियां चित्रित की गयी हैं। नीचे लाल पत्थर के पुराने सिंहासन पर जहां पहले कोई प्रतिमा रही होगी, श्रीकृष्ण की एक प्रतिमा भक्तों ने विराजमान कर दी है।

पूर्व की दीवार में एक दरवाजे का चिह्न था, जो ईदगाह के नीचे को जाता था। आगे काफी अंधेरा था। उसके मुख को पत्थर से बन्द करवा दिया गया। कक्ष के फर्श पर भी पत्थर लगे हुए हैं। उत्तर की ओर सीढिय़ां हैं यह स्थान अति प्राचीन है। वेदी पर भक्तजन श्रद्धा पूर्वक माथा टेककर धन्य होते हैं। दक्षिण की ओर बाहर निकलने के लिये एक दरवाजा निकाल दिया गया।

चबूतरे के तीनों ओर जो पुश्ता के खंडहर थे, बड़ी कठिनाइयों से तोड़े गये। उनको तोड़कर नीचे की कुर्सी स्वच्छ बना दी गयी और उस पर मारबल चिप्स फर्श बना दिया गया है। इस कुर्सी से दो फीट निचाई पर ढालू और ऊंची-नीची दोनों ओर की जो भूमि थी, उसको समतल करके उसमें बाटिका लगा दी गयी। इस भूमि की खुदाइर में अनेक अवशेष निकले हैं, जो विध्वंस किये हुए मन्दिरों के हैं और पुरातन की दृष्टि से बड़े महत्व के हैं। इन सबको सुरक्षा की दृष्टि से मथुरा राजकीय संग्रहालय को दे दिया गया है।

भागवत आचार्य श्री रवि नंदन शास्त्री जी महाराज जी


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