ऐसे पाएं मन की शांति

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Tuesday, August 27, 2013-12:29 PM

जब कभी हम शांत होंगे, सहज होंगे, संयत होंगे, व्यवस्थित होंगे या संतुलित होंगे तो वह ज्ञान परम शांति पैदा करेगा, आपको सहज बना देगा, आप नैसर्गिक हो जाएंगे, स्वाभाविक हो जाएंगे तथा प्राकृतिक हो जाएंगे, जैसे प्रकृति निर्दोष, निश्छल और बड़ी सहज है। ऐसी सहजता जो धरती, अंबर, अग्नि, जल, वायु या निहारिकाओं में है, फूलों की गंध में है और जो स्वाभाविकता ओस के नन्हे से कण में है, घनघोर घटनाओं से घिरे अंबर में है तथा बरसती एवं नाचती मेघ-धाराओं में है।

कभी-कभी जब व्यक्ति खुद को असहज पाता है, उन्मत पाता है, चपल या चंचल पाता है तो उसके मूल में उसकी भौतिक मांग, उसकी वैषयिक मांग, पदार्थगत आकर्षण तथा जगत का सम्मोहन होता है। यह तब होता है जब हम अपनी इंद्रियों पर अंकुश नहीं रख पाते, जब मन पर हमारा नियंत्रण खो जाता है, जब हम मन से नियंत्रण खो बैठते हैं अथवा जब हमारी बुद्धि के भ्रम बढ़ जाते हैं।

संसार के सारे आकर्षण, सारे प्रलोभन या भीतर की सारी लालसाएं भोगपूर्ति तथा कामनापूर्ति के लिए होती हैं। जब वे बहुत लालायित होती हैं और हम बहिर्मुख होते हैं या हमारा स्वयं से नियंत्रण छूट जाता है तब हम असंयमित होते हैं, असंतुलित होते हैं तथा अपने आप में एक व्याकुलता पाते हैं। उस समय वह ज्ञान काम में आता है जो आपको सीमांकन दे, सहजता प्रदान करे, आपको साधकर रखे, आपको संतुलित रखे तथा आपको व्यवस्थित रखे।


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