अनुभव और कुशलता से ऐसे परिणामों से बचा जा सकता है

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Thursday, August 29, 2013-9:06 AM

भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण का जन्म उत्सव बड़ी ही धूम-धाम से पूरे देश में मनाया जाता है। भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार क्यों लिया, धर्म ग्रंथों के अनुसार इसका कारण इस प्रकार है- द्वापर युग में जब पृथ्वी पर मानव रूपी राक्षसों के अत्याचार बढऩे लगे। तब पृथ्वी दु:खी होकर भगवान विष्णु के पास गईं। तब भगवान विष्णु ने कहा मैं शीघ्र ही पृथ्वी पर जन्म लेकर दुष्टों का सर्वनाश करूंगा।

द्वापर युग के अन्त में मथुरा में उग्रसेन राजा राज्य करते थे। उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था। कंस ने उग्रसेन को बलपूर्वक कारागार में डाल स्वयं राजा बन गया थी। कंस की बहन देवकी का विवाह यादव कुल में वासुदेव के साथ तय हुआ। जब कंस देवकी को विदा करने के लिए जा रहा था तो आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र कंस का वध करेगा ।

यह सुनकर कंस डर गया और उसने देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल दिया और एक-एक कर देवकी की होने वाली संतानों का वध करने लगा। आठवें गर्भ से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ लेकिन माया के प्रभाव से किसी को इस बात का पता नहीं चला कि देवकी की आठवी संतान गोकुल में नंदबाबा के यहां पल रही है। यहां भी श्रीकृष्ण ने अपनी लीला से कई राक्षसों का वध किया और अंत में कंस का वध कर राजा उग्रसेन को सिंहासन पर बैठाया।

श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में पाण्डवों का साथ दिया और अधर्म का नाश कर धर्म रूपी युधिष्ठिर को सिंहासन पर बैठाया। आज अनेक लोग चाहे घर हो या कार्यालय में, अपनी जीवनशैली, दिनचर्या और वक्त के कुप्रबंधन की वजह से परेशान और तनाव में रहते हैं। ऐसे हालात से निजी जीवन से लेकर नौकरी या कारोबार से जुड़े सभी कामों पर बुरा असर पड़ता है। सही योजना और प्रबंधन की कमी से तमाम जद्दोजहद करने के बाद भी मनचाहे नतीजे नहीं मिल पाते।

अनुभव और कुशलता से ऐसे परिणामों से बचा जा सकता है। लेकिन अगर अध्यात्म और धर्म के जरिए कुछ रणनीति सीखना चाहें तो भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से कुछ तरीके सीखे जा सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण का कुशल प्रबंधन और बेहतर रणनीति देखने को मिलती है कुरुक्षेत्र के मैदान में।

महाभारत के युद्ध में पाण्डव और उनकी सेना, कौरवों और उनकी सेना के मुकाबले संख्या और ताकत में कमतर थी। किंतु श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के साथ सही युद्ध नीति और प्रबंधन के जरिए पाण्डवों को छोटी सेना से भी जीत दिलाई। जीवन भी कुरुक्षेत्र की भांति ही संघर्ष से भरा है,जहां हर व्यक्ति सफलता पाने और हक के लिए जूझता रहता है।

कुरुक्षेत्र के युद्ध में श्रीकृष्ण की विजय में व्यावहारिक जीवन के लिए यही संदेश है कि कामयाबी के लिए ज्यादा या कम योग्यता और साधन ही मायने नहीं रखते बल्कि उस योग्यता का सही और कुशलता से उपयोग सफलता के लिए बहुत जरूरी है। आधुनिक समय में मानव प्रबंधन की बात करें तो सफलता में परिवार का साथ तो जरूरी है, पर बाहरी दुनिया या कार्यालय में सभी लोगों से संपर्क, सहयोग और मधुर व्यवहार की भी सफलता में अहम भूमिका होती है।


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