मोह-अहंकार को दूर करना चाहते हैं तो....

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Friday, August 30, 2013-8:05 AM

एक बार नारद जी को काम वासना पर विजय पाने का अहंकार हो गया। उन्होंने उसे भगवान विष्णु के समक्ष भी अभिमान सहित प्रकट किया। भगवान ने सोचा कि भक्त के मन में मोह-अहंकार नहीं रहने देना चाहिए। उन्होंने अपनी माया का प्रपंच रचा। सौ योजन वाले अति सुरमय नगर में शीलनिधि नाम का राजा राज्य करता था। उसकी पुत्री परम सुन्दरी विश्व मोहिनी का स्वयंम्बर हो रहा था।

उसे देखकर नारदजी के मन में मोह वासना जागृत हो गयी। वे सोचने लगे कि नृपकन्या किसी विधि उनका वरण कर ले। भगवान को अपना हितैषी जानकर नारद जी ने प्रार्थना की भगवान प्रकट हो गये और उनके हित साधन का आश्वासन देकर चले गये। मोहवश नारदजी भगवान की गूढ़ बात को समझ नहीं सके। वे आतुरतापूर्वक स्वंयवर भूमि में पहुंचे।

नृप बाला ने नारदजी का बन्दर का सा मुंह देखकर उनकी ओर से मुंह फेर लिया। नारदजी बार-बार उचकते-मचकते रहे। विष्णु भगवान नर वेष में आए। नृप सुता ने उनके गले में जयमाला डाल दी। वे उसे ब्याह कर चल दिए। अपनी इच्छा पूरी न होने पर नारद जी को गुस्सा आ गया और मार्ग में नृप कन्या के साथ जाते हुए भगवान को शाप दे डाला। भगवान ने मुस्करा कर अपनी माया समेट ली। अब वे अकेले खड़े थे।

नारदजी की आंख खुली की खुली रह गयी। उन्होंने बार-बार क्षमायाचना की,' भगवन!मेरी कोई व्यक्तिगत इच्छा न रहे,आपकी इच्छा ही मेरी अभिलाषा हो, लोक-मंगल की कामना ही हमारे मन में रहे।"

नारद भगवान से निर्देश-संदेश लेकर जन-जन तक उसे पहुंचाने के लिए उल्लास के साथ धरती पर आये एवं व्यक्ति के रूप में नहीं अपितु समष्टि में संव्याप्त चेतन प्रवाह के रूप में व्यापक बने। आज ध्वंस की तमिस्त्रा के मध्य जो नव सृजन का अलोक बिखरा दिखाई पड़ रहा है,वह इसी का प्रतिफल है।

भक्त की स्वयं की कोई इच्छा नहीं होती। वह भगवान का काम करने का संकल्प लेकर जन्मता है व आपने'स्व' को चेतन शक्ति में घुला देता है। देवऋषि नारद ने अपनी इच्छा को भगवान की प्रेरणा के साथ मिलाया। जब नारदजी स्वयं मोह में पड़े थे तब आपने अहंकार के मद में प्रभु प्रेरणा को समझने में असफल रहे।

भगवान ने उनका मोह भंग किया,उन्हें वास्तविकता से अवगत कराया। तब से उन्होंने संकल्प ले लिया कि अब आगे से कभी अपनी इच्छा को प्रभु से अलग नहीं करेंगे। नारदजी ने भगवान विष्णु को नमन किया और उनकी इच्छा में अपनी इच्छा मिलते हुए जन-जन को'प्रज्ञा पुराण' का सन्देश सुनाने,जागृत-आत्माओं को प्रज्ञा-अभियान प्रयासों में लगाने का संकल्प लेकर, प्रसन्न ह्रदय धरती पर उतरे। सप्त ऋषियों की तपोभूमि में थोड़ा विराम-विश्राम करके वे युगान्तरीय-चेतना के रूप में विश्वव्यापी बन गये।


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