कृष्णावतार

  • कृष्णावतार
You Are HereDharm
Saturday, August 31, 2013-10:56 AM

प्रद्यूत ने जो राजभवन का मुख्य रक्षक था, अपने सहायकों को बुला कर नगर में शांति बनाए रखने का आदेश दे दिया। भीड़ ने सारे बाड़े तोड़ डाले थे और कृष्ण जी को घेर कर लोग कृष्ण-वासुदेव के जयकारे बोल रहे थे। हर्ष से उछलते-कूदते हुए बहुत से लोग उन्हें साक्षात दंडवत कर रहे थे और बहुत से लोग उनके चरण स्पर्श कर रहे थे। श्री कृष्ण ने आज कंस के वर्षों से चले आ रहे अत्याचार से उनका उद्धार जो किया था।

श्री कृष्ण ने सब पर दुख भरी दृष्टि डाली और अपने दोनों हाथ उठाए। भीड़ उनका संकेत पाकर शांत हो गई। इसके बाद श्री कृष्ण ने कहा, ‘‘यह हर्ष मनाने का समय नहीं है। शांतिपूर्वक सब लोग अपने-अपने घर जाएं, हमारा युवराज मर गया है, हम शोक मना रहे हैं।’’

भीड़ छंटने लगी। लोग सिर झुकाए अपने-अपने घरों को जाने लगे। इसके बाद श्री कृष्ण उस स्थान पर पहुंचे जहां नंद राय जी गोपालों से घिरे खड़े थे। कृष्ण जी अपने पालक पिता के चरणों में गिर पड़े। नंद राय जी ने उन्हें उठा कर अपनी छाती से लगा लिया।

श्री कृष्ण जी ने कहा, ‘‘बाबा, मैंने जो कुछ किया है उसके लिए मुझे क्षमा करें। ये अत्याचार समाप्त होने ही चाहिएं। देवाधिदेव महादेव की ऐसी ही इच्छा थी।’’ ‘‘कृष्ण, मेरे लाडले बेटे देवाधिदेव महादेव जी तुम्हें 100 साल की अवस्था प्रदान करें।’’

नंद राय जी ने रुंधे हुए कंठ से कहा। श्री कृष्ण के सखा उद्धव जी के पास उनके वस्त्र थे। उन्होंने कृष्ण जी को उनकी धोती दे दी। कृष्ण जी ने दूसरे वस्त्र ग्रहण करने से इंकार कर दिया। वह अपने मामा का शोक जो मना रहे थे और शोक के दिनों में सगे-संबंधियों के लिए धोती के सिवाय अन्य वस्त्र पहनना उस युग में वर्जित था।

‘‘पिता जी, आप अपने पड़ाव को चले जाएं। दाह कर्म संस्कार समाप्त होने के पश्चात मैं आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊंगा।’’ श्री कृष्ण ने नंद राय जी से कहा।                                                                                                                                                                                                                                                        (क्रमश:)

अपना सही जीवनसंगी चुनिए| केवल भारत मैट्रिमोनी पर- निःशुल्क रजिस्ट्रेशन

Recommended For You