कृष्णावतार

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Friday, September 06, 2013-7:41 AM

जब श्रीकृष्ण ने देवकी जी की चरणवंदना की तो उनके नेत्र सजल हो गए थे परंतु वे आंसू ऐसे ही थे जैसे दुखों की घटा के बाद वर्षा सब को ठंडक पहुंचाती है और सबके मन में अपार हर्ष उमड़ आता है। कैसे चमत्कार हुए आज एक-एक करके! चानरुड़ को धरती पर पटक कर उसने यमलोक पहुंचा दिया। उसके बड़े दादा ने मुष्टिक की खोपड़ी फोड़ डाली और फिर कृष्ण ने मेरे ताया के दुष्ट पुत्र को केशों से पकड़ कर धरती पर घसीट लिया और उसकी छाती पर चढ़ कर उसका गला दबा कर उसने उसकी पापों से भरी जीवन लीला समाप्त कर दी।

भगवान वेदव्यास की भविष्यवाणी का एक-एक शब्द सत्य सिद्ध होकर रहा। यही तो सुन रहे हैं कि वह साक्षात भगवान हैं और उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकेगा। उन्होंने अपनी भारी गरज जैसी आवाज से कहा था। देवकी रानी का मन आज जितना प्रसन्न था उतना 25 वर्ष में कभी एक पल के लिए भी नहीं हुआ था फिर उन्होंने धरती और आकाश कम्पायमान कर दिए। सहस्त्रों कंठों से निकलते जयकारे सुने। जय कृष्ण भीड़ को समझा रहे थे। सारी भीड़ ने उन्हें मार्ग दे दिया था।

दासियों से घिरी हुईं वह जल्दी से छज्जे से उतर कर नीचे के बरामदे में आकर खड़ी हो गईं। यह प्रतीक्षा करने लगीं कि वह दृष्टिï उठाकर उनकी ओर भी देखें परंतु अब तो वह उनकी ओर ही आ रहा था। मार्ग में उसने अपने पालक पिता नंद राय जी की चरण वंदना की फिर वह मुस्कराता हुआ वह उनके पास ही चला आ रहा था।

श्रीकृष्ण के होंठों पर वैसी ही मद्धम मुस्कान थिरक रही थी जैसी कि देवकी जी सपनों में नित्य ही देखा करती थीं। बस एक युग और इतने वर्षों से रुका हुआ बांध टूट गया। उनके नेत्रों से पूरे वेग से जलधारा बहने लगी। उन्होंने अपनी भुजाएं फैला दीं। उसने भी अपनी भुजाएं फैला दीं। देवकी रानी ने उसे अपने अंक में भर लिया।
                                                                                                                                                                              (क्रमश:)


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