यहां राधाष्टमी पर स्नान करने से अनेकों प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है

  • यहां राधाष्टमी पर स्नान करने से अनेकों प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है
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Wednesday, September 11, 2013-7:45 AM

विश्व विश्व भर में सर्वाधिक धर्मस्थल हमारे भारत में ही स्थित हैं। जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश में पीर पंजाल की पहाडिय़ों के पूर्वी हिस्से में तहसील भरमौर में कैलाश पर्वत के शिखर समुद्र तल से 19000 फीट की ऊंचाई व मणि महेश झील जो 15000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है 21 वर्ष पहले सन् 1992 में अपने पिता श्री एम.डी. सभ्रवाल व उनके मित्र प्रताप सरंगल के साथ मणि महेश जाने का मौका मिला था और अब सन् 2013 में दोबारा जाने का अवसर प्राप्त हुआ। अब पुरातन स्थल व श्री कैलाश के दर्शनों को छोड़ सब कुछ बदल चुका है।

श्रद्धा व आस्था के साथ 21 वर्षों में वहां पर मणि रूप में भोले बाबा के दर्शन हेतु श्रद्धालुओं का सैलाब इतना बढ़ चुका है कि जरूरत है ऐसे धार्मिक स्थलों पर प्रशासन के सहयोग की ताकि श्रद्धालुओं को असुविधा न हो। आज से बहुत वर्ष पूर्व तक इन यात्राओं को एक दुष्कर कार्य माना जाता था लेकिन आज ऐसा कुछ नहीं है। यातायात की सुविधाओं ने इस समस्या को काफी कम कर दिया है।

अब आप वाहन से सीधे हरसर पहुंच सकते हैं। उसके आगे 14 मील की यात्रा पैदल पूरी करनी होती है। पैदल न जाने वालों के लिए घोड़े, खच्चरों की सवारी की भी व्यवस्था है। आसमान छूते हिमशिखरों, फैले हुए ग्लेशियर जो अब ग्लोबल वार्मिंग से काफी कम हो चुके हैं, अल्हड़ नदी-नालों के बीच से होता हुआ श्रद्धालु मणिमहेश झील पहुंचता है।

यह झील एक ऐसी रमणीक घाटी में स्थित है। पौराणिक कथाओं में यह झील भगवान शिव की धरती मानी जाती है। इसके उत्तरी भाग में जंगसर पर्वत व दक्षिण की ओर धौलाधार पर्वत पड़ते हैं। एक किंवदंती के अनुसार सतयुग में मणि महेश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विवाह के उपरांत सभी देवगणों के साथ यहां पधारे थे। इसी कारण इस स्थल की मान्यता है। श्रद्धालु हर वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी से राधाष्टमी तक इस स्थान पर लगने वाले मेले में बहुत ही उत्साह के साथ भाग लेते हैं।

हजारों की संख्या में शिव भक्त श्रद्धालु मणि महेश झील में स्नान कर पूजा करते हैं और अपनी इच्छा पूरी होने पर लोहे का त्रिशूल, कड़ी व झंडी इत्यादि चढ़ाते हैं। राधाष्टमी वाले दिन जब सूरज की किरणें कैलाश शिखर पर पड़ती हैं तो उस समय स्नान करने से मनुष्य को अनेकों प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है।

मणि महेश यात्रा चम्बा से शुरू होकर राख, खड़ा मुख इत्यादि स्थानों से होती हुई भरमौर पहुंचती है। यात्रा की खोज का श्रेय योगीराज चरपट नाथ जी को है। यात्रा शुरू करने से पहले भरमौर से 6 किलोमीटर पहाड़ी के शिखर पर ब्रह्मा जी की पुत्री भरमाणी देवी का मंदिर स्थित है। कहा जाता है मणिमहेश की यात्रा से पूर्व यहां पर आने से ही यात्रा पूर्ण मानी जाती है।

मान्यता है कि भरमौर की अधिष्ठात्री देवी ने इस स्थल को चौरासी सिद्धों को दिया था और देवी खुद रहने के लिए मलकोता गांव के पास टीले पर चली गई थीं। तब भगवान शिव ने देवी को वरदान दिया कि मणिमहेश यात्रा तभी सफल होगी जब भक्तजन भरमाणी माता के दर्शन करेंगे, भरमौर स्थित चौरासी स्थल नामक स्थान पर भगवान मणिमहेश का मंदिर स्थित है। इस मंदिर प्रांगण में चौरासी मंदिर हैं। भरमाणी दर्शन उपरांत चौरासी मंदिर होकर यात्रा प्रारंभ की जाती है। यहां एकमात्र धर्मराज का मंदिर स्थित है। यात्रा के अवसर पर इस मंदिर में राज्य स्तर का मेला लगता है। भरमौर से हरसर तक शिवलिंग की पूजा व स्थापना वर्जित है। मान्यता है कि यहां शिव स्वयं साक्षात हैं। इसलिए मूर्ति रूप में तो उन्हें पूजित किया जा सकता है परन्तु शिवलिंग रूप में नहीं।
 
पंजाब के पठानकोट से होते हुए बनीखेत के रास्ते चम्बा 120 कि.मी. पड़ता है। चम्बा से भरमौर 70 कि.मी. और भरमौर से हरसर 13 कि.मी. की दूरी  पर स्थित है। इससे आगे हरसर से मणि महेश पैदल खड़ी चढ़ाई संकरे व पथरीले रास्ते वाली यात्रा 14 मील है। तंग पहाडिय़ों में बसा हरसर इस क्षेत्र का अंतिम गांव है। हरसर से यात्रा प्रारंभ मार्ग पर घोड़े उपलब्ध थे जिनको जिला मैजिस्ट्रेट चम्बा द्वारा अधिकृत पहचान पत्र जारी किए गए थे जिस पर हरसर से मणिमहेश  तक किराया 800 रु. दर्ज किया गया था परन्तु ये घोड़े वाले यात्रियों से 2000 रुपए से 2500 रुपए प्रति घोड़ा ले रहे थे और बेबस यात्री इसी हिसाब से उन्हें पैसे देते दिखाई दिए। अगर प्रशासन थोड़ी सख्ती करे तो श्रद्धालुओं की परेशानी कम हो सकती है।

हरसर से पैदल चढ़ाई करते पहला पड़ाव आता है, धनछोह-यह रास्ता बहुत मुश्किल व कठिन है परन्तु हर भक्त के लिए आसान है क्योंकि उसकी आस्था उसके इरादों को दृढ़ बनाती है। कई बार कोई पहाड़ खिसक जाता है। मौसम अगर खराब हो जाए तो फिसलन बहुत बढ़ जाती है। पैदल मार्ग के साथ-साथ चलते घोड़े भी यात्रा मार्ग को और दुर्गम बना देते हैं। यहां यात्रा मार्ग में शिव भक्तों को कल-कल बहती रावी नदी का साथ मिलता है, वहीं धौलाधार पर्वत, हरियाली युक्त वातावरण व मन में कैलाश पर्वत के दर्शनों की उमंग शिव भक्तों के मन में उल्लास पैदा कर देती है।

रास्ते में नदी पर कई छोटे-छोटे पुल आते हैं। प्राकृतिक दृश्य आने वाले यात्रियों का उत्साह बढ़ाते हैं। धनछोह में शिव भक्तों की ओर से रहने व खाने-पीने का पूर्ण प्रबंध किया जा रहा है। पैदल आने वाले यात्री यहां आकर रात रुकते और सुबह अपनी यात्रा फिर शुरू करते हैं। यहां का मौसम भी काफी ठंडा होता है। यात्री अपनी जरूरी दवाई, गर्म कपड़े, छाता व बरसाती साथ रखें ताकि यात्रा में कठिनाई न आए।

धनछोह से दो मार्ग अलग-अलग हो जाते हैं एक खड़ी चढ़ाई व दूसरा घुमावदार पहाड़ी पर पथरीला रास्ता दोनों तरफ का मार्ग सांस फुलाने वाला परन्तु शिव-भक्तों के आगे क्या पहाड़ और क्या पर्वत! मान्यता है जब दैत्यों के अत्याचार अधिक हो गए तब भगवान शिव की कृपा से भस्मासुर इसी स्थान पर भस्म हुआ था। शिव भक्त घराट नामक स्थल पर भीमकाय पहाड़ के अंदर से ऐसी आवाजें आती हैं जैसे हजारों जहाज एक साथ चल रहे हों।  गौरीकुंड पहुंचने पर प्रथम कैलाश शिखर के दर्शन होते हैं।

गौरीकुंड माता गौरी का स्नान स्थल है, मेले में आने वाली स्त्रियां यहां स्नान करती हैं। यहां से डेढ़ कि.मी. की सीधी चढ़ाई के बाद मणिमहेश झील पहुंचा जाता है। यह झील पहाड़ों से घिरी हुई देखने वालों की थकावट को क्षण भर में दूर कर देती है यहां पुरुषों के स्नान करने की परम्परा है नीले रंग का पानी अनेक रोगों की दवाई है। बादलों में घिरा कैलाश पर्वत शिखर दर्शन देने के लिए कभी-कभी ही बाहर आता है।

इस दर्शन उपरांत ही तपस्या सफल होती है। कैलाश पर्वत को भगवान शिव का शरीर माना जाता है। इस पर चढऩा अशुभ होता है। सरोवर से पूर्व दिशा में स्थित गगनचुंबी पर्वत नीलमणि के गुण से युक्त है। सुबह की पहली किरण जब मणि महेश पर्वत के पीछे से फूटती है तो पर्वत शिखर के कोने में एक अद्भुत प्राकृतिक छल्ला बन जाता है। यह दृश्य किसी बहुमूल्य नगीने की भांति होता है। इस दृश्य को देख शिवभक्तों की थकावट क्षणभर में दूर हो जाती है। दर्शनों उपरांत झील स्थित स्थान पर  नतमस्तक करने पर यात्रा पूर्ण होती है।

मणिमहेश झील के दर्शन व स्नान करने की इच्छा प्रत्येक श्रद्धालु की होती है परन्तु वहां साफ-सफाई रखना भी प्रत्येक यात्री का फर्ज है। यात्रा समाप्त होने उपरांत सारी गंदगी पहाड़ों, झरनों, खासकर कुदरत  को परेशान करती है। यह यात्रा आने वाले सालों में और श्रद्धालुओं से भर जाएगी। केंद्र सरकार व हिमाचल के मुख्यमंत्री को इस यात्रा संबंधी कड़े नियम व कानून बनाने चाहिएं ताकि आने वाले श्रद्धालु बिना किसी भय व तकलीफ से मणिमहेश की यात्रा पूर्ण कर सकें व अपने मनवांछित फल प्राप्त कर सकें।   
                                                                                                                                                           —प्रिंसीपल गुलशन सभ्रवाल


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