अपने प्रतिबिम्ब को देखकर श्री कृष्ण क्यों डर गए?

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Wednesday, September 11, 2013-8:27 AM

जब भगवान बिना किसी सहारे के अनायास ही खड़े होकर चलने लगे। एक दिन सांवरे-सलोने ब्रज के राजकुमार श्री कन्हैया जी अपने सूने घर में स्वंय ही माखन चुरा रहे थे। उनकी द्रृष्टि मणि के खम्भे में पड़े हुए, अपने प्रतिविम्ब पर पड़ी। जिसे देखकर वो डर गये।

अपने प्रतिविम्ब से बोले, अरे भैया! मेरी मैया से मत कहियो, तेरे भाग भी मेरे बराबर ही मुझे स्वीकार है ले, खा-खा ले, भैया।

यशोदा माता अपने लाला की तोतली बोली सुन रही थी। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ, माता को देखते ही श्रीकृष्ण ने अपने प्रतिविम्ब को दिखाकर बात बदल दी मैया! मैया! यह कौन है?

लोभवश तुम्हारा माखन चुराने के लिए आज घर में घुस आया है। मैं मना करता हूं तो मानता नहीं है और मै क्रोध करता हूं, तो यह भी क्रोध करता है। मैया! कुछ और मत सोचना मेरे मन में माखन का तनिक भी लोभ नहीं है। कृष्ण की ऐसी बातें सुनकर माता आनंद से मग्न हो गयी।

धूरि भरे अति सोभित स्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरैं अंगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी॥
वा छबि को रसखान बिलोकत, वारत काम कला निधि कोटी।
काग के भाग कहा कहिए, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥

                                                                                                         -भागवत आचार्य श्री रवि नंदन शास्त्री जी महाराज जी


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