कृष्णावतार

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Thursday, September 12, 2013-9:25 AM

श्री कृष्ण ने कहा, "वह कुछ भी न बोल सकीं।"

उनका कंठ रुंध गया और वह बेहोश होकर गिरने लगीं। श्री कृष्ण ने उन्हें अपनी बांहों में संभाल कर गिरने से रोक लिया। यदुवंशी सामंत, कुछ तो बहुत ही प्रसन्न और उत्साह में भरे हुए थे। परिवार और शांति का आभास तो सभी को हो रहा था। सभी वसुदेव जी के भवन में इकट्ठे हो गए।

वसुदेव जी भी गर्ग आचार्य के साथ वहां गए। उन दिनों वह उज्जयिनी के राजकुमारों विंद और अनुविंद के गुरु थे जो अवंति के राजा के जुड़वां पुत्र थे तथा कंस के राज्य अतिथियों में सम्मिलित थे। आचार्य सांदीपन गर्ग आचार्य के पास वृंदावन में ही कुछ समय तक रहे थे और कृष्ण जी तथा बलराम जी प्रतिदिन ही उनकी चरणवंदना करने के लिए उनके पास जाया करते और उनके उपदेश सुना करते थे। उन्हें महामुनि भगवान वेद व्यास जी ने वृंदावन भेजा था।

प्रद्यूत यादव सामंतों के साथ वहां पहुंच गया। वे सब नगर में शांति स्थापना करने में जुटे थे। परम आदरणीय, अब हमारे सामने बहुत कठोर स्थिति उत्पन्न हो गई है। प्रद्यूत ने वसुदेव जी से कहा।

मुझे मालूम है कि हमारे कुछ अतिथि कंस के गहरे मित्र हैं। अब वे निश्चय ही हमारे शत्रु बन गए हैं। मात्र इतनी सी समस्या नहीं है। मगध देश का सम्राट जरासंध अपने दामाद का  विरोध करने के लिए हमें कभी भी क्षमा नहीं करेगा। कंस की दो रानियां जो जरासंध की पुत्रियां हैं, हमारे विरुद्ध विद्रोह खड़ा कर सकती हैं।
                                                                                                                                                                      (क्रमश:)
                      

 


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