भगवान से हम कैसे प्रेम करें ?

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Monday, September 16, 2013-7:39 AM
 

प्रेम वह रचनात्मक भाव है जो आत्मा की अनंत शक्तियों को जाग्रत कर उसे पूर्णता के लक्ष्य तक पहुंचा देता है इसलिए विश्व-प्रेम को ही परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ उपासना के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। जीवन के सुन्दरतम रूप की यदि कुछ अभिव्यक्ति हो सकती है तो वह प्रेम में ही है पर उसे पाने ओर जाग्रत करने का यह अर्थ नहीं होता कि मनुष्य सुख और मधुरता में ही विचरण करता रहे , वरन उसे कष्ट , सहिष्णुता और वीरोचित यत्नों का जागरण करना भी अनिवार्य हो जाता है। प्रेम का वास्तविक आनंद तभी मिलता है ...

प्रेम संसार की ज्योति है और सब उसी के लिए संघर्ष करते हैं। सच्चा समर्पण भी प्रेम के लिए ही होता है , इसलिए यह जान पड़ता है कि विश्व की मूल रचनात्मक शक्ति यदि कुछ होगी तो वह प्रेम ही होगी और जो प्रेम करना नहीं सीखता, उसे ईश्वर की अनुभूति कभी नहीं हो सकती।तुलनात्मक अध्यन करें तो भी यही लगता है कि परमेश्वर की सच्ची अभिव्यक्ति ही प्रेम है। प्रेम भावनाओं का विकास कर मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। प्रेम से बढ़कर जोडऩे वाली (योग) शक्ति संसार में और कुछ भी नहीं है। प्रेम एक महान योग है। इसे धर्म शास्त्रों तथा आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रेम योग के नाम से भी कहा गया है। जिसने सत्य प्रेम का अमृत प्राप्त कर लिया अथवा जिसने उपाय, अभ्यास एवं साधना द्वारा अपनी आत्मा में प्रेम का स्फुरण कर लिया है, वह योगी है। उसका प्रेम योग न केवल संसार के दु:ख दर्दों से ही अपने साधक को मुक्त रखेगा बल्कि उसे उस गति का भी अधिकारी बना देगा जो योगियों की निश्चित एवं नैसर्गिक उपलब्धि है।

यह निश्चित बात है की जब तक स्वार्थपूर्ण भावनाओं का उन्मूलन नहीं होता तब तक विशुद्ध कत्र्तव्य भावना का उदय नहीं होता इसलिए जैसे ही हम फल की कामना से रहित होकर केवल कर्तव्य की दृष्टि से काम करने लगते हैं वैसे ही अपने अंत:करण में प्रेम का प्रादुर्भाव होने लगता है। प्रेम के बिना कर्म कौशल संभव नहीं , जो प्रेम की प्रेरणा से हो वही योग है अर्थात परमात्मा को प्राप्त करने का सबसे सीधा रास्ता और सरल उपाय विशुद्ध प्रेम ही है। प्रेम एक बहुत व्यापक शब्द है। सच्चा प्रेम परमार्थ का प्रमुख अंग है। यदि हम सृष्टि और विश्व के सुदृढ रहस्यों पर विचार करें तो प्रतीत होगा कि प्रेम का सच्चा पात्र परमेश्वर ही है। जिसने हमें कुमार्ग पर जाने से रोक कर सन्मार्ग पर चलाने को बाध्य किया। जिसने हम को देव दुर्लभ तन, मन, विवेक और सब प्रकार की कार्यक्षमता प्रदान की और जन्म से मरण तक हमारी सुख-सुविधा की व्यवस्था करता है।

यदि हम कुमार्ग पर चलते हैं तो हमारी आंखे खोलने के लिए दंड विधान द्वारा भी हमको पतन के खड्डे में गिरने से बचने के लिए प्रयत्न करता है। वही ईश्वर हमारे प्रेम, भक्ति, श्रद्धा का पात्र हो सकता है पर भगवान से हम कैसे प्रेम करें ? यह एक बड़ी समस्या है। यदि हम भगवान के बनाये प्राणियों के दु:ख,आभाव,कष्टों में भाग लेकर उनकी विषम परिस्थितियों का कुछ समाधान करने में समर्थ हो सकें तो यही परमात्मा की सच्ची सेवा मानी जा सकती है और इसी प्रकार उसके प्रति प्रेम प्रकट किया जा सकता है।परमेश्वर की सच्ची अभिव्यक्ति ही प्रेम है और प्रेम भावनाओं का विकास कर मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। प्रेम से बढकर जोडऩे वाली शक्ति संसार में और कुछ भी नहीं है।

                                                                                                                                                                    - कृष्णा सिस

 


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