भगवान गणेश जी की कृपा प्राप्त करने के लिए....

  • भगवान गणेश जी की कृपा प्राप्त करने के लिए....
You Are HereDharm
Tuesday, September 17, 2013-6:55 AM

भगवान गणेश आदिदेव माने गए हैं। उनका पूजन करने से धन-धान्य बढ़ता है। भगवान गणेश का पूजन और आराधना करने से सभी प्रकार की समस्याएं जैसे रोग, आर्थिक समस्या, भय, नौकरी, व्यवसाय, मकान, वाहन, विवाह, संतान, प्रमोशन आदि संबंधित सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है। गणपती जी को उनकी प्रिय वस्तुएं अर्पित करने से उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है-

1. मोदक- भगवान गणेश को स्‍वादिष्‍ट भोजन और मिष्ठान अत्यधिक प्रिय है। गणेश जी को मिठाई में मोदक अति प्रिय है। च्मोदज् यानी आनंद व च्कज् का अर्थ है छोटा-सा भाग। मोदक का अर्थ है कि आनंद प्रदान करने की शक्ति तो गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए मोदक का भोग लगाएं ।

2. गेंदा फूल- गणपती जी को गेंदे के फूल अत्यधिक प्रिय है। उनके गले में सदैव गेंदे के फूल की माला ही पहनाएं ।

3. दूर्वा की घास- दूर्वा आर्थात हरी दूब एक प्रकार की घास है। जो गणपति पूजन में गणेश जी को अर्पित की जाती है। दूर्वा अर्पण से गणेश जी प्रसन्न होते हैं। हरी दूब भगवान श्री गणेश को बहुत प्रिय है। इक्कीस दूर्वा को एकत्रित कर मोली में गांठ लगाकर गणेशजी को मस्तक मुकुट के रूप पर चढ़ाई जाती है।

4. शंख- गणेश जी की चार भुजाएं हैं, जिनमें से उनके एक हाथ में शंक है। गणेश जी को शंक की ध्वनि बहुत प्रिय है इसलिये उनकी आरती करते समय तेज़ धवनि से शंख बजाएं। समुद्र मंथन के समय देव- दानव संघर्ष के दौरान समुद्र से 14 अनमोल रत्नों की प्राप्ति हुई। जिनमें आठवें रत्न के रूप में शंखों का जन्म हुआ। जिनमें सर्वप्रथम पूजित देव गणेश के आकार के गणेश शंख का प्रादुर्भाव हुआ जिसे गणेश शंख कहा जाता है। इसकी स्थापना मात्र से ही गणेश कृपा की अनुभूति होने लगाती है। इसके सम्मुख नित्य धूप- दीप जलना ही पर्याप्त है किसी जटिल विधि- विधान से पूजा करने की जरुरत नहीं है।

5. केला और नारियल- भगवान गणेश का सिर हाथी का है तो इसलिये इन्‍हें हाथी की तरह केला खाना बहुत पसंद है। इनकी मूर्ती के चारों तरफ का एरिया केवल केले की पत्‍तियों और तने से ही सजाई जाती हैं।

6 सिन्दूर- नौ वर्ष की अवस्था में गणेश जी महर्षि पाराशर के आश्रम में निवास करते थे। उस समय सिन्दूरासुर नामक असुर वहां भारी उपद्रव मचा रहा था। उसके भय से कोई भी देव पूजन, यज्ञादि नहीं हो रहे थे। जब गणेश जी को ज्ञात हुआ तो वो बहुत क्षुब्ध हुए और उन्होंने महर्षि पाराशर से आज्ञा लेकर सिन्दूरासुर से युद्ध किया। उस युद्ध में गजानन ने विराट रूप धारण किया और सिन्दूरासुर का कण्ठ पकड़ लिया तथा उसे अपने वज्र सदृश्य दोनों हाथों से दबाने लगे। सिन्दूरासुर के नेत्र बाहर निकल आए और उसी क्षण उसके प्राण निकल गए। गजानन ने उसके लाल रक्त को अपने दिव्य अंगो पर लगाना आरंभ कर दिया। तभी से गणेश जी को सिन्दूर चढ़ाया जाता है।


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You