अनन्त चतुर्दशी व्रत धन,ऐश्वर्य और संसारिक सुखों की प्राप्ति के लिये किया जाता है

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Wednesday, September 18, 2013-7:43 AM

भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी,अनन्त चतुर्दशी के रुप में मनाई जाती है। इस दिन भगवान श्री हरि का एक स्वरूप श्री अनन्त भगवान के रूप की पूजा करते हैं और संकटों से रक्षा करने वाला अनन्तसूत्र बांधा जाता है। इस दिन कच्चे सूत के लच्छे में 14 गांठ लगाकर उसे हाथ पर बांधने की परम्परा है।


 सारे दिन व्रत रखा जाता है तथा इस दिन सतयुग में घटित महर्षि सुमंन्त की कन्या शीला और उनके पति कौंडिन्य मुनि की कथा सुनाई जाती है। इस व्रत को श्री कृष्ण भगवान की प्रेरणा से पाण्डवों ने भी रखा था और उन्हें 14 वर्ष पश्चात राज्य एवं वैभव की प्राप्ति हुई थी। यह उपवास युगों युगों से धन, ऐश्वर्य और सद्मार्ग से संसारिक सुखों की प्राप्ति के लिये किया जाता रहा है और वर्तमान में भी एक महत्वपूर्ण उपवास है। अनंत चतुर्दशी के पूजन में व्रतकर्ता को प्रात:स्नान करके ॐ अनन्तायनम: मंत्र क जाप करना चाहिए। पूजा के पश्चात अनन्तसूत्र मंत्र पढकर स्त्री और पुरुष दोनों को अपने हाथों में अनंत सूत्र बांधना चाहिए।


सत्ययुग में सुमन्तुनाम के एक मुनि थे सुमन्तु मुनि ने अपनी कन्या का विवाह कौण्डिन्यमुनि से कर देते हैं। उनकी पत्नी शीला अनन्त-व्रत का पालन किया करती थी और अनन्तसूत्र बांधती हैं। व्रत के प्रभाव से उनका घर धन-धान्य से पूर्ण हो जाता है परंतु एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के हाथ में बंधे अनन्तसूत्रपर पडती है और वह अपनी पत्नी से इसे अपने हाथ से उतार देने को कहते हैं। शीला ने विनम्रतापूर्वक उन्हें कहती है कि यह अनंत भगवान का सूत्र है परंतु अपने मद में चूर ऋषि उस धागे का अपमान करते हैं और उसे जला देते हैं।

 इस अपराध के परिणाम स्वरुप उनका सारा सुख समाप्त हो जाता है, दीन-हीन कौण्डिन्य ऋषि अपने अपराध का प्रायश्चित हेतु चौदह वर्ष तक निरंतर अनन्त-व्रत का पालन करते हैं। उनके श्रद्धा पूर्वक व्रत पालन द्वारा भगवान अनंत श्री हरि प्रसन्न हो उन्हें क्षमा कर देते हैं और ऋषि को पुन: ऎश्वर्य एवं सुख की प्राप्ती होती है।

 भारतीय संस्कृति में निहित भक्ति एवं शक्ति का पर्व अनन्त चतुर्दशी महोत्सव, मूलत: दो प्रमुख पर्वों को जोड़ता है। यह गणेश जी के जन्मोत्सव गणेश चतुर्थी से प्रारंभ हो कर श्री अनन्त चतुर्दशी तक के 10-11 दिन की अवधि में मनाया जाता है।गणेश जी पंचदेवों में प्रथम पूज्य हैं, गुरू पूजा से भी पूर्व आराधना योग्य हैं।

सभी मतों व पंथों में मौखिक व आध्यात्मिक कर्मों में प्रथम पूज्य के रूप में लोकमान्य हैं। सर्वाधिक लोकप्रिय देवताओं में एक गणेश या गणपति को बुद्धि का प्रतीक और सौभाग्य लाने वाला माना जाता है। उनकी दोनों पत्नियां रिद्धि व सिद्धी हैं। रिद्धि का पुत्र लाभ है और सिद्धी का पुत्र शुभ है। दोनों पत्नियां श्री गणेश जी के दांये - बांये विराजती हैं अनके साथ ही उनके पुत्र शुभ और लाभ हैं इसलिये ये सुख, समृद्धि और वैभव के देव माने गये हैं।

इसी कारण ये मंगल करने वाले और अमंगल हरने वाले, प्रभावशाली देव के रूप में पूज्य हैं। भगवान श्री गणेश की प्रतिष्ठा सम्पूर्ण भारत में समान रूप से व्याप्त है, महाराष्ट्र में मंगलकारी देवता के रूप में मंगल मूर्तिच्च् के नाम से पूज्य है। महाराष्ट्र में अष्टगणपति के आठ तीर्थ स्थान प्रसिद्ध हैं। जहां की परिक्रमा करना प्रत्येक महाराष्ट्रीयन हिन्दू अपना पवित्र कर्म मानता है।

दक्षिण भारत में भी इनकी विशेष लोकप्रियता कला शिरोमणिच् के रूप में है। मैसूर तथा तंजौर के मंदिरों में गणेश की नृत्य मुद्रा में अनेक मनमोहक प्रतिमाएं हैं। इस दौरान गणेश चतुर्थी से घरों में गणेश जी की प्रतिमाओं तथा मोहल्लों में झांकियो की स्थापना होती है। नित्य प्रात: सायं पूजा अर्चना एवं आरती होती है, भक्ति संध्याएं आयोजित की जाती हैं तथा श्री अनन्त चतुर्दशी के दिन इन गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। अनेकानेक स्थानों पर यह विसर्जन शोभा यात्रा के रूप में सम्पन्न होता है।

                                                                                                                       - भागवत आचार्य श्री रवि नंदन शास्त्री जी महाराज जी


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