श्राद्ध का दिखावा नहीं करें, उसे गुप्त रुप से एकांत में करें

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Thursday, September 19, 2013-7:50 AM

आज से श्राद्धपक्ष शुरू होंगे। श्राद्ध और तर्पण करने से पितृश्वर तृप्त होकर वंश वृद्धि-सुख शांति का आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध तिथि पर किया जाने वाला तर्पण और श्राद्ध पितरों की अक्षय तृप्ति का साधक होता है। तिलांजलि से तृप्त होकर पितृ आशीर्वाद प्रदान करते हैं। तिल मिश्रित जल और कुश के साथ किए गए तर्पण को ही तिलांजलि कहा जाता है। पितृशांति के लिए सम्पूर्ण श्राद्ध पक्ष में तर्पण करें, संभव न हो तो श्राद्ध तिथि को अवश्य करें।

 श्राद्ध पक्ष में पितृ दोष निवारण के लिए किए गए उपायों को करने से पितरों के आशीर्वाद के फलस्वरुप संतान सुख, सम्पत्ति लाभ, राज्य सुख आदि की प्राप्ति होती है। रोग तथा असामयिक दुर्घटनाओं से बचाव होता है। पितृश्वरों के आशीर्वाद से ही जन्म कुंडली में निर्मित पितृदोष के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है। याज्ञवल्क्य का कथन है कि श्राद्ध देवता श्राद्ध कर्ता को दीर्घ जीवन, आज्ञाकारी संतान, धन विद्या, संसार के सुख भोग भी प्रदान करते हैं।

श्राद्ध में ध्यान रखें
श्राद्ध केवल अपराह्न काल में ही करें। श्राद्ध में तीन वस्तुएं पवित्र हैं- दुहिता पुत्र, कुतपकाल (दिन का आठवां भाग) तथा काले तिल। श्राद्ध में तीन प्रशंसनीय बातें हैं- बाहर-भीतर की शुद्धि, क्रोध नहीं करना तथा जल्दबाजी नहीं करना। ‘पद्म पुराण‘ तथा ‘मनुस्मृति‘ के अनुसार श्राद्ध का दिखावा नहीं करें, उसे गुप्त रुप से एकांत में करें। धनी होने पर भी इसका विस्तार नहीं करें तथा भोजन के माध्यम से मित्रता, सामाजिक या व्यापारिक संबंध स्थापित न करें। श्राद्ध काल में गीताजी, श्रीमद्भगवत, पितृसूक्त, पितृसंहिता, रुद्र्रसूक्त, ऐंद्रसूक्त, मधुमति सूक्त आदि का पाठ करना मन, बुद्धि एवं कर्म तीनों की शुद्धि के लिए अत्यन्त फलप्रद है।

श्राद्ध काल में जपनीय मंत्र -

1. ॐ क्रीं क्लीं ऐं सर्वपितृभ्यो स्वात्म सिद्धये  ॐ फट।।

2.  ॐ सर्व पितृ प्रं प्रसन्नो भव  ॐ।।

3.  ॐ  पितृभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधानम: पितामहेभ्य स्वधायिभ्य: स्वधा नम:। प्रपितामहेभ्य स्वधायिभ्य: स्वधा
नम: अक्षन्न पितरो मीमदन्त
पितरोतीतृपन्त पितर: पितर: शुन्दध्वम्।।  ॐ पितृभ्यो नम:।।

क्या चाहते हैं पितर
स्कंदपुराण में कहा गया है कि सूर्यदेव के कन्या राशि पर स्थित रहते समय आश्विन कृष्णपक्ष (श्राद्धपक्ष या महालय) में पितर अपने वंशजों द्वारा किए जाने वाले श्राद्ध व तर्पण से तृप्ति की इच्छा रखते हैं। जो मनुष्य पितरों की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध -तर्पण करेंगे, उनके उस श्राद्ध से पितरों को एक वर्ष तक तृप्ति बनी रहेगी। उस समय और अमावस्या के दिन वंशज यदि श्राद्ध नहीं करता है, उसके पितर भूख-प्यास से पीड़ित हो बहुत दुखी होते हैं।

श्राद्धपक्ष बीत जाने पर भी कुछ पितर तुला राशि के सूर्य तक पूरे कार्तिक मास में अपने वंशजों द्वारा किए जाने वाले श्राद्ध की राह देखते हैं। जब सूर्यदेव वृश्चिक राशि पर चले जाते हैं तब वे पितर दीन एवं निराश होकर अपने स्थान पर लौट जाते हैं। अत: जब तक कन्या और तुला पर सूर्य रहते हैं (आश्विन और कार्तिक मास में) तब तक तथा प्रत्येक अमावस्या के दिन सदा पितरों के लिए श्राद्ध करना चाहिए।

विशेषत: तिल और जल की अंजलि देनी चाहिए। ब्रह्मपुराण में कहा गया है :
‘आयु: प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितर: श्राद्ध तर्पिता।।’

 अर्थात श्राद्ध के द्वारा प्रसन्न हुए पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष तथा स्वर्ग आदि प्रदान करते हैं। इस वर्ष श्राद्धपक्ष 19 सितम्बर से 4 अक्तूबर तक रहेगा इस दौरान मांगलिक कार्य, शुभ कार्य, विवाह और विवाह की बात चलाना वर्जित है।
 
कैसे करें श्राद्ध
विष्णु पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों के द्वारा ही होती है। अत: श्राद्ध के अवसर पर दिवंगत पूर्वजों की मृत्यु तिथि को निमंत्रण देकर ब्राह्मण को भोजन, वस्त्र एवं दक्षिणा सहित दान देकर श्राद्ध कर्म करना चाहिए। इस दिन पांच पत्तों पर अलग-अलग भोजन सामग्री रखकर पंचबलि करें ये हैं- गौ बलि, श्वान बलि, काक बलि, देवादि बलि तथा पिपिलिकादि बलि (चींटियों के लिए)। 

श्राद्ध कब नहीं करें
पूर्वजों की मृत्यु के प्रथम वर्ष में श्राद्ध नहीं करें। पूर्वाह्न में, शुक्ल पक्ष में, रात्रि में तथा अपने जन्म दिन में श्राद्ध नहीं करने चाहिएं। कूर्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति अग्नि, विष आदि के द्वारा आत्म हत्या करता है उसके निमित्त श्राद्ध तर्पण करने का विधान नहीं है। इसी प्रकार चतुर्दशी तिथि को श्राद्ध नहीं करना चाहिए। इस तिथि को मृत्यु प्राप्त पितरों का श्राद्ध दूसरे दिन अमावस्या को करने का विधान है।

                                                                                                     -डॉ. महेश शर्मा


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