पितृश्वरों के आशीर्वाद से ही पितृदोष के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है

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Thursday, September 19, 2013-7:48 AM

ज्योतिषशास्त्र में नवग्रहों से निर्मित योगों के आधार पर पितृदोष की भविष्यवाणी की जाती है। नवग्रहों में बृहस्पति और शनि क्रमश: आकाश और वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। जबकि राहु चुंबकीय क्षेत्र का, सूर्य पिता का, चंद्र माता का, शुक्र पत्नी का और मंगल भाई का प्रतिनिधित्व करता है। राहु एक छाया ग्रह है और प्रेतात्माएं भी छाया रूप में ही विद्यमान रहती हैं।

अत: कुंडली में राहु की स्थिति पितृ दोष का निर्धारण करने में महत्वपूर्ण है। यदि राहु सूर्य के साथ युति करे तो सूर्य को ग्रहण लगेगा। सूर्य पिता का कारक होने के कारण पितृदोष का कारण बनेगा तथा राज्य का कारक होने से राज्य पक्ष से नुक्सान पहुंचाएगा। इसी प्रकार माता के कारक चंद्र की राहु और सूर्य से युति मातृ दोष का कारण बनेगी जिससे भूमि, भवन और वाहन से कष्ट की आशंका बनी रहेगी, चंद्रमा मन का कारक होने से मन में अनावश्यक घबराहट के कारण असफलता एवं मानसिक तनाव रहेगा।


जन्म कुंडली में बारहवां भाव, सूर्य-शनि की युति और राहु का प्रभाव पितृदोष का कारण बनता है। सूर्य नीचगत, शत्रुक्षेत्रीय अथवा राहु-केतु के साथ द्वादश भाव में स्थित हो तो पितृदोष बनता है। जिनकी जन्मकुंडली में पितृ दोष विद्यमान हो वे पितृपक्ष में श्राद्ध-तर्पण करें

ॐ ऐं पितृदोष शमनं ह्रीं ॐ  स्वधा

मंत्र का जप करें। नारायण गया श्राद्ध, विष्णु श्राद्ध, नान्दीमुख श्राद्ध कराएं। रुद्राभिषेक कराएं। शैय्या दान करें। लोकहितार्थ तालाब, पुल, नल या प्याऊ आदि लगवाने चाहिएं। ब्राह्मणों को यथाशक्ति भोजन, वस्त्र, फल, दक्षिणा आदि का दान करें। किसी निर्धन और जरूरतमंद व्यक्ति को तिल दान करें।

                                                                                                                                                                             -डॉ. महेश शर्मा


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