श्राद्धकर्म किस उद्देश्य से किया जाता है?

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Saturday, September 21, 2013-6:55 AM

शास्त्रों द्वारा जन्म से ही मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण अर्थात कर्तव्य बतलाये गये हैं:- देवऋण, ऋषिऋण तथा पितृऋण। अत: स्वाध्याय द्वारा ऋषिऋण से, यज्ञों द्वारा देवऋण से तथा संतानोत्पत्ति एवं श्राद्ध (तर्पण, पिण्डदान) द्वारा पितृऋण से मुक्ति पाने का रास्ता बतलाया गया है। इन तीनों ऋणों से मुक्ति पाये बिना व्यक्ति का पूर्ण विकास एवं कल्याण होना असंभव है।

बच्चों एवं सन्यासियों के लिए पिण्डदान नहीं किया जाता। पिण्डदान उन्हीं का होता है जिनको मैं-मेरे की आसक्ति होती है। बच्चों की मैं-मेरे की स्मृति और आसक्ति विकसित नहीं होती और सन्यास ले लेने पर शरीर को मैं मानने की स्मृति सन्यासी को हटा देनी होती है। शरीर में उनकी आसक्ति नहीं होती इसलिए उनके लिए पिण्डदान नहीं किया जाता। पितृपक्ष की सभी पंद्रह तिथियां श्राद्ध को समर्पित हैं। अत: वर्ष के किसी भी माह एवं तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों का श्राद्ध उसी तिथि को किया जाना चाहिए अगर पितरों के लिए किया गया पिण्डदान एवं श्राद्धकर्म व्यर्थ होता तो वे मृतक पितर स्वप्न में यह नहीं कहते कि: हम दु:खी हैं।

हमारे लिए पिण्डदान करो ताकि हमारी पिण्ड की आसक्ति छूटे और हमारी आगे की यात्रा हो... हमें दूसरा शरीर, दूसरा पिण्ड मिल सके। शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी से ऊपर सात लोक माने गये है- (सत्य, तप, महा, जन, स्वर्ग, भुव:, भूमि)। इन सात लोकों में से भुव: लोक को पितरों का निवास स्थान अर्थात पितृलोक माना गया है। अत: पितृलोक को गये हमारे पितरों को कोई कष्ट न हो, इसी उद्देश्य से श्राद्धकर्म किये जाते है।

भुव: लोक में जल का अभाव माना गया है, इसीलिए सम्पूर्ण पितृपक्ष में विशेष रूप से जल तर्पण करने का विधान है। इस पितृपक्ष में सभी पितर भुव: अर्थात पितृलोक से पृथ्वीलोक की ओर प्रस्थान करते हैं तथा विना निमंत्रण अथवा आवाहन के भी अपने-अपने सगे-सम्बन्धियों के यहां पहुंच जाते हैं तथा उनके द्वारा किये होम, श्राद्ध एवं तर्पण से तृप्त हो, उन्हें सर्वसुख का आर्शीवाद प्रदान करते हैं।

                                                                                                                                                               -आचार्य तिलक मणि


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