...तो पितर प्रेत योनि में चले जाते है

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Monday, September 23, 2013-7:59 AM

जब पितरों के कर्मों का लोप होने लगता है अर्थात जातक के द्वारा पितरों के श्राद्ध आदि कर्म उचित व विधिपूर्वक नहीं किये जाते है तो पितर प्रेत योनि में चले जाते है और जातक के वंश वृद्धि, धन वृद्धि, विकास, पद, प्रतिष्ठा आदि में बाधायें आने लगती है। पूर्वजों के लिए श्रद्धा के साथ धर्म-कर्म, दान व तर्पण आदि नियत हैं। खासतौर पर श्राद्ध पक्ष में पितरों के श्राद्ध के लिए धर्म-कर्म, भोजन आदि में कुछ विशेष चीजों का उपयोग करके उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है

- मान्यता है कि पितृगण गरुड़ जी पर सवार होकर विष्णुलोक को जाते हैं। तुलसी जी से पिंड की पूजा करने पर पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।

 - श्राद्ध कर्म करते समय गंगाजल, दूध, शहद, कुश और केले के पत्ते पर श्राद्ध का भोजन अर्पित नहीं करना चाहिए। सोने, चांदी, कांसे व तांबे के बर्तनों का उपयोग करना सर्वदा उत्तम हैं। अगर इनका अभाव हो तो पत्तलों का इस्तेमाल करें।

- श्राद्ध कर्म में तिल का उपयोग करने से पितर खुश होते हैं।

- आसन में लोहे का प्रयोग करना वर्जित है। रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन का उपयोग करें।

- काला उड़द, बड़ा उड़द, चना, मसूर, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काली सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न का श्राद्ध के भोजन में उपयोग न करें।


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