भगवान जुगलकिशोर भी अपने पूर्वजों का तर्पण करने के लिए यहां आते हैं

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Wednesday, September 25, 2013-7:09 AM

पितृपक्ष में इंसान ही नहीं भगवान भी अपने पूर्वजों को याद करते हैं। इसका गवाह है मध्य प्रदेश के पन्ना जिले का ऐतिहासिक जुगल किशोर मंदिर। यहां जुगलकिशोर जी को पितृपक्ष के दौरान रंगीन पोशाक नहीं पहनाई जाती। वर्ष में एक पखवाड़े का समय पूर्वजों को याद करने का होता है। सनातन परंपरा के अनुसार इस एक पखवाड़े के समय में पूर्वज पृथ्वी के सबसे करीब होते हैं, इसीलिए पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए तर्पण किया जाता है और उन्हें प्रसन्न करने के लिए धार्मिक अनुष्ठानों का दौर चलता है।

परंपरा के मुताबिक पन्ना जिले के निवासी धर्मसागर तालाब पर पहुंचकर तर्पण करते हैं, क्योंकि माना जाता है कि भगवान जुगलकिशोर भी अपने पूर्वजों को तर्पण करने के लिए यहां आते हैं। धर्मसागर तालाब पर पहुंचने वालों को महसूस होता है कि तर्पण के समय जुगलकिशोर भी उनके साथ हैं।

योगेश अवस्थी का कहना है कि,"पितृपक्ष में पूरे विधि विधान से धर्म सागर तालाब पर तर्पण किया जाता है। यहां भगवान जुगलकिशोर भी अपने पूर्वजों के लिए तर्पण करने आते हैं। ऐसी मान्यता है, और इस परंपरा को यहां के लोग निर्वहन भी करते आ रहे हैं।"

जुगलकिशोर मंदिर के पुजारी प्रेम बताते हैं कि,"भगवान को भी पितृपक्ष के दौरान रंगीन पोशाक नहीं पहनाई जाती है। रियासत काल से यह परंपरा चली आ रही है, जिसके मुताबिक पितृपक्ष के दौरान जुगलकिशोर जी को सिर्फ सफेद रंग की पोशाक पहनाई जाती है। इस बार भी ऐसा ही है।"

मान्यता के मुताबिक पितृपक्ष में कोई उत्सव नहीं होता और शुभ कार्य भी नहीं होते हैं। इतना ही नहीं इन दिनों में खरीदारी का दौर भी धीमा पड़ जाता है। यही कारण है कि जुगलकिशोर जी को भी पितृपक्ष में रंगीन पोशाक नहीं पहनाई जाती। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को पन्ना में आज भी निभाया जा रहा है।


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