कृष्णावतार

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Thursday, September 26, 2013-11:02 AM

‘‘मात्र इतनी सी समस्या नहीं है। मगध देश का सम्राट जरासंध अपने दामाद के विरोध के लिए हमें कभी भी क्षमा नहीं करेगा। कंस की दो रानियां जो जरासंध की पुत्रियां हैं, हमारे विरुद्ध विद्रोह खड़ा कर सकती हैं। कंस के लाए हुए दो सहस्त्र मगधी योद्धा यहां मथुरापुरी में हमारे बीच उपस्थित हैं। हम नहीं कह सकते कि वे क्या कर डालने पर आमादा हो जाएंगे।’’ प्रद्यूत ने आगे बताया।
 
वसुदेव जी ने यह सुनकर उत्तर दिया, ‘‘अवश्य ही हमें कुछ न कुछ करना चाहिए। इस विषय में हम लोगों में कोई मतभेद नहीं होना चाहिए।’’

‘‘बंदीगृह में रहते-रहते राजा उग्रसेन बहुत दुर्बल हो गए हैं। हमें शीघ्र ही अपने राजा का चुनाव कर लेना चाहिए।’’ प्रद्यूत ने कहा।

कुछ सामंतों के मन में सेनापति प्रद्यूत की नीयत पर संदेह हुआ कि वह स्वयं राजा बनना चाहते हैं इसलिए उन्होंने कहा कि, ‘‘इस कार्य के लिए इतनी जल्दी क्या है!’’

कुछ देर सोचने के बाद वसुदेव जी ने प्रद्यूत का समर्थन किया और बोले, ‘‘कंस के स्थान पर हमें किसी न किसी को राजा बना देना चाहिए। यह हमारे शत्रुओं को हमारी चुनौती होगी।’’

‘‘पूज्य गर्ग आचार्य का क्या विचार है?’’ प्रद्यूत ने पूछा!

‘‘मैं भी तुम्हारे विचार से पूर्ण रूप से सहमत हूं।’’ गर्ग आचार्य ने उत्तर दिया, ‘‘अवश्य ही मथुरा का सर्वनाश करने के लिए जोड़-तोड़ किए जाएंगे। हमें इस समय अपनी सारी शक्ति संचित कर लेनी होगी।’’

‘‘हमें तुरंत ही कार्य करना होगा, जो यादव सामंत देश त्याग कर चले गए हैं और जिन्हें देश से निकाल दिया गया है, उन सबको लौट आने के लिए निमंत्रण देना होगा और उनके साथ नए सिरे से मेल-जोल करना होगा।’’ प्रद्यूत ने कहा। 
                                                                                                                                                                                                                                                               (क्रमश:)

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