जन्म कुंडली में बृहस्पति किस राशि पर कौन सा फल देता है

  • जन्म कुंडली में बृहस्पति किस राशि पर कौन सा फल देता है
You Are HereDharm
Thursday, October 03, 2013-6:47 AM

बृहस्पति गृह नवी राशि धनु और बारहवी राशि मीन का स्वामी है । यह एक पुरुष प्रकृति  के गृह है जो की एकान्तप्रिय होकर 8 वे अंश पे प्रभावी है । बृहस्पति गृह पुनर्वसु ,विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रो का स्वामी भी है। फलित ग्रंथों के अनुसार बृहस्पति ग्रह नवग्रहों में सबसे शुभ है। जन्म कुंडली में बृहस्पति किस राशि पर कौन सा फल देता है वे इस प्रकार है :-

मेष में गुरु हो तो जातक तर्क वितर्क करने वाला,किसी से न दबने वाला ,सात्विक,धनी,कार्य क्षेत्र में विख्यात,क्षमाशील ,पुत्रवान,बलवान,प्रतिभाशाली,तेजस्वी,अधिक शत्रु वाला,बहु व्ययी, दंडनायक व तीक्ष्ण स्वभाव का होता है।

वृष में गुरु हो तो जातक वस्त्र अलंकार प्रेमी ,विशाल देह वाला ,देव -ब्राह्मण -गौ भक्त, प्रचारक ,सौभाग्यशाली, अपनी स्त्री में ही आसक्त ,सुन्दर कृषि व गौ धन युक्त,वैद्यक क्रिया में कुशल ,मनोहर वाणी-बुद्धि व गुणों से युक्त ,विनम्र तथा नीतिकुशल होता है।

मिथुन में गुरु हो तो जातक ,विज्ञान विशारद,बुद्धिमान,सुनयनी,वक्ता,सरल,निपुण,धर्मात्मा ,मान्य ,गुरुजनों व बंधुओं से सत्कृत होता है।

कर्क में गुरु हो तो जातक विद्वान,सुरूप देह युक्त ,ज्ञानवान ,धार्मिक, सत्य स्वभाव वाला,यशस्वी ,अन्न संग्रही ,कोषाध्यक्ष,स्थिर पुत्र वाला,संसार में पूज्य,विशिष्ट कर्मा तथा मित्रों में आसक्त होता है।

सिंह में गुरु हो तो जातक स्थिर शत्रुता वाला ,धीर ,विद्वान,शिष्ट परिजनों से युक्त,राजा या उसके तुल्य,पुरुषार्थी,सभा में लक्ष्य,क्रोध से समस्त शत्रुओं को जीतने वाला ,सुदृढ़ शरीर का ,वन-पर्वत आदि के भ्रमण में रूचि रखने वाला होता है।

कन्या में गुरु हो तो जातक मेधावी,धार्मिक ,कार्यकुशल, गंध -पुष्प-वस्त्र प्रेमी ,कार्यों में स्थिर, शास्त्रज्ञान व शिल्प कार्य से धनी दानी ,सुशील चतुर ,अनेक भाषाओं का ज्ञाता तथा धनी होता है।

तुला मे गुरु हो तो जातक मेधावी ,पुत्रवान,विदेश भ्रमण से धनी विनीत,आभूषण प्रिय ,नृत्य व नाटक से धन संग्रह करने वाला ,सुन्दर ,अपने सह व्यापारियों में बड़ा,पंडित, देव अतिथि का पूजन करने वाला होता है।

वृश्चिक में गुरु हो तो जातक अधिक शास्त्रों में चतुर,क्षमाशील, नृपति, ग्रंथों का भाष्य करने वाला,निपुण ,देव मंदिर व नगर में कार्य करने वाला , सद्स्त्रीवान,अल्प पुत्र वाला ,रोग से पीड़ित, अधिक श्रम करने वाला, क्रोधी, धर्म में पाखण्ड करने वाला व निंद्य आचरण वाला होता है।

धनु में गुरु हो तो जातक आचार्य, स्थिर धनी, दाता, मित्रों का शुभ करने वाला, परोपकारी,शास्त्र में तत्पर, मंत्री या सचिव ,अनेक देशों का भ्रमण करने वाला तथा तीर्थ सेवन में रूचि रखने वाला होता है।

मकर में गुरु हो तो जातक अल्प बलि ,अधिक मेहनत करने वाला ,क्लेश धारक,नीच आचरण करने वाला ,मूर्ख ,निर्धन , दूसरों की नौकरी करने वाला,दया,धर्म,प्रेम,पवित्रता,स्व बन्धु व मंगल से रहित,दुर्बल देह वाला,डरपोक,प्रवासी,विषाद युक्त होता है।

कुम्भ में गुरु हो तो जातक चुगलखोर,असाधु,निंद्य कार्यों में तत्पर, नीच जन सेवी,पापी,लोभी,रोगी, अपने वचनों के दोष से अपने धन का नाशक ,बुद्धिहीन व गुरु की स्त्री में आसक्त होता है।

मीन में गुरु हो तो जातक वेदार्थ शास्त्र वेत्ता ,मित्र व सज्जनों द्वारा पूजनीय ,राज मंत्री ,प्रशंसा प्राप्त करने वाला ,धनी ,निडर ,गर्वीला, स्थिर कार्यारम्भ करने वाला,शांतिप्रिय,विख्यात, नीति व व्यवहार को जानने वाला होता है।

(गुरु पर किसी अन्य ग्रह कि युति या दृष्टि के प्रभाव से उपरोक्त राशि फल में परिवर्तन भी संभव है। )

 


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You