आज पितृगण लौट जाएंगे पितृलोक में

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Friday, October 04, 2013-10:37 AM

सर्वप्रथम स्नान करके गायत्री मंत्र से शिखा बांध कर तिलक लगाएं। दो कुशों से बनाई हुई पवित्री दाहिने हाथ की अनामिका के मूल भाग में और तीन कुशों से बनाई गई पवित्री बाईं अनामिका के मूल में ॐ भूर्भुव: स्व: मंत्र पढ़कर धारण करें। फिर हाथ में तीन कुश, जौ, अक्षत और जल लेकर संकल्प पढ़ें-

‘अद्य श्रुतिस्मृति पुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं देवर्षिमनुष्य दिव्यपितृतर्पणं करिष्ये।’

दिव्य पितरों का तर्पण करने के पूर्व :

ॐ आगच्छन्तु में पितर इमं गृह्नन्तु जलान्जलिम।।’

मंत्र से उनका आह्वान करें। अब जल, तिल और कुश के साथ दक्षिण की ओर मुंह कर पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता, मातामह, प्रमातामह के निमित्त तीन-तीन तिलांजलि इन मंत्रों से दें :

ॐ कव्यवाडनलस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:, तस्मै स्वधा नम:, तस्मै स्वधा नम:।।

ॐ सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:।

ॐ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:।।

ॐ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:।।

ॐ अग्निश्वात्ता: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं तेभ्य: स्वधा नम:, तेभ्य: स्वधा नम:, तेभ्य: स्वधा नम:।।

ॐ सोमपा: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं तेभ्य: स्वधा नम:।।

ॐ बर्हिषद: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं तेभ्य: स्वधा नम:।।

                                                                                                                                                                               -डॉ. महेश शर्मा


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