कृषणावतार

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Thursday, October 10, 2013-8:00 AM

वसुदेव जी तथा वहां उपस्थित अन्य सब महाुरुषों द्वारा अपने प्रशंसा भरे वचन सुन कर भी श्री कृष्ण तनिक प्रसन्न नहीं हुए। उन्होंने अपना सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘मैं प्रसन्न नहीं, कंस मामा की विधवा रानियों के हृदय विदारक विलाप मैं सुन नहीं सका। मेरे मामा उन सब के एक योग्य पति थे।’’

श्रीकृष्ण ने रूंधे हुए कंठ से कहा। कुछ सामंतों को अपने शूरवीर परित्राणकत्र्ता की इस मानसिक दुर्दशा एवं मन की कोमलता पर आश्चर्य हुआ।  उन्होंने कहा, ‘‘अब तो उन बेचारियों जीवन सदा ही दुखों से भरा रहेगा।’’

जिन लोगों ने श्रीकृष्ण जी की बातें सुनीं वे गुमसुम बैठे रह गए। श्री कृष्ण के कुछ और कहने से पहले ही अक्रूर जी अत्यंत दुर्बल राजा उग्रसेन को सहारा देते हुए सभा में ले आए। बलराम जी उनके पीछे आ रहे थे। श्रीकृष्ण ने कहा, ‘‘परन्तु मैं कर ही क्या सकता था? होनी एक न एक दिन समाप्त होकर ही रहती है। भगवान महादेव जी की इच्छा को कौन टाल सकता है। उनकी इच्छा ऐसी ही थी।’’

बलराम जी ने बाबक अंधक के पुत्र धुरांधक को संभाला हुआ था जिन्हें तीन दिन पहले रात को कंस के कहने से वत्र्रघन ने घायल कर दिया था और जिनके शरीर पर स्थान-स्थान पर पट्टियां बंधी हुई थीं।        
                                                                                                                                                                   (क्रमश:)

 

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