पूजन बने फलदायी अगर वास्तु हो दुरुस्त

  • पूजन बने फलदायी अगर वास्तु हो दुरुस्त
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Saturday, October 12, 2013-10:57 AM
सच्चे मन से व सही ढग से पूजा करें। इससे ध्यान केन्द्रित होता है और पूजा का फल भी जल्दी प्राप्त होता है। वास्तु शास्त्र में पूजा-पाठ, जप-तप के लिए कुछ आवश्यक सुझाव दिए गए हैं, जिनका पालन करने से पूजन को विशेष फलदायी बनाया जा सकता है।

1 देवालय स्थापित करने के लिए ईशान कोण यानि उत्तर व पूर्व का समागम कोण सबसे उत्तम है। ईशान का अर्थ होता है ईश्वर का स्थान। अगर इस दिशा में पूजा स्थल बनाना संभव न हो तो इसे उत्तर या पूर्व दिशा में बनाएं।

2 जहां देवालय स्थापित किया हो वहां सूर्य की रोशनी एवं ताजा हवा का समावेश अवश्यक रूप से होना चाहिए।

3 पूजन कक्ष में चमड़े की कोई वस्तु, जूता-चप्पल, मृतकों, पूर्वजों के चित्र न रखें। पूर्वजों के चित्र दक्षिण दिशा की दीवार पर लगाने चाहिए।

4 पूजा-स्थल और मंदिर में अंतर होता है। वास्तु के मतानुसार ईश-प्रतिमा की स्थापना घर में नहीं करनी चाहिए। अंगूठे के एक पर्व से लेकर एक बलिस्त तक की ईश-प्रतिमा की स्थापना गृहस्थ को पूजा-स्थल में करनी चाहिए।

5 शास्त्रों में पूजा की पांच पद्धतियों का वर्णन किया गया है अभिगमन, उपादान, योग, स्वाध्याय व इज्या। पूजन के समय इन पद्धतियों का उपयोग करने से भौतिक सुखों के साथ-साथ आध्यात्मिक उपलब्धियां भी प्राप्त होती है।

6 पूजन के दौरान बासी फूल, पत्ते व जल को प्रयोग में न लाएं मगर गंगाजल और तुलसी पत्ता कभी बासी नहीं होते।

7 खंडित,सूंघा हुआ, आग में झुलसा हुआ फूल भगवान को कदापि न चढ़ाएं।

8 पूजन के समय ध्वनि का भी अत्यधिक महत्व है। शंख व घंटानाद न सिर्फ देवों को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है बल्कि इससे वातावरण भी शुद्ध होता है।


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