आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ाए विजय दशमी

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Sunday, October 13, 2013-5:02 PM

विजयदशमी का पावन पर्व न केवल हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा को ही बढ़ाता है बल्कि यह दिन शास्त्रों में किसी भी मांगलिक कार्य के लिए वर्ष भर के प्रशस्त दिनों में भी एक है। सभी तरह के शुभ कार्य व अनुष्ठान आदि विजयदशमी को अनंत फल देने वाले हो जाते हैं। दशहरा शक्तिपूजन का दिन है। इसीलिए प्राचीन शास्त्रीय परंपरा के अनुरूप आज तक क्षत्रिय-क्षत्रपों के यहां शक्ति के पूजन के रूप में अस्त्र-शस्त्रों का अर्चन होता है। सभी कार्यों में सिद्धि प्रदान करने वाला दशहरा पर्व है, जो सभी मनोवांछित फल प्रदान करता है।

अबूझ है विजय दशमी
विजय दशमी तिथि अनेक कार्यों के लिए प्रशस्त मानी जाती है। इसे कई विद्वानों ने 'अबूझ' माना  है। संस्कार युक्त कार्य यथा-नामकरण, अन्न प्राशन, चौलकर्म संस्कार अर्थात मुंडन संस्कार, कर्णवेध, यज्ञोपवीत व वेदारंभ आदि संस्कार करने अत्यंत श्रेष्ठ दिन माना जाता है। यह जरूर ध्यान रखने की बात है कि 'अबूझ' होने पर भी इस दिन विवाह संस्कार नहीं करना चाहिए क्योंकि यह शास्त्रों में बिल्कुल निषिद्ध है। संस्कार से जुड़े इन कार्यों के अतिरिक्त अनेक मांगलिक कार्य भी इस दिन संपन्न किए जा सकते हैं। भूमि पूजन अर्थात शिलान्यास, गृहप्रवेश, व्यापार आरंभ, वाहन क्रय, आभूषण क्रय व नवीन सामग्री इस दिन खरीदी जा सकती है।

दशमी का विजय पर्व
दशमी तिथि का ग्रहण सूर्योदय के पहले की तारों की छांव में ही माना गया है। इसका तात्पर्य यह है कि सूर्योदय से पहले ही जिस समय दशमी तिथि प्रारंभ हो जाए, उसी दिन विजय दशमी मानी जाती है। गणितज्ञों का मानना है कि यदि सूर्योदय दशमी तिथि में नहीं हुआ हो तो नवमी तिथि में ही दशमी तिथि का ग्रहण भी मान लेना चाहिए।

हां, यह जरूर ध्यान देने की बात है कि यह मुहूर्त केवल विजय दशमी अर्थात आश्विन मास का शुक्ल दशमी तिथि के लिए ही है। एकादशी युक्त दशमी तिथि का ग्रहण कदापि विजय दशमी के रूप में नहीं मानना चाहिए। विजय दशमी किसी भी कार्य को सिद्ध करने के लिए यात्रा प्रारंभ करने में सर्वाधिक प्रशस्त है। परंतु विजय यात्रा के लिए दिन के 'ग्यारहवें मुहूर्त' में ही प्रस्थान करना चाहिए। एक मुहूर्त का समय शास्त्रों में 2 घटी अर्थात 48 मिनट माना गया है। इस ग्यारहवें मुहूर्त का नाम ही 'विजय' है। इस 'विजय' नामक मुहूर्त से युक्त होने के कारण ही आश्विन शुक्ल दशमी को 'विजय दशमी' कहा जाता है। यदि दशमी तिथि क्षय तिथि के रूप में आ जाए तो श्रवण नक्षत्र से विजय दशमी तिथि को ग्रहण करना चाहिए।


शास्त्रों में इसका स्पष्ट उल्लेख है कि-
आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये।
स कालो विजयो ज्ञेय: सर्वकामार्थसिद्धये।। 

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में दशमी तिथि को 'विजया' कहते हैं, जो सभी कार्यों में सिद्धि प्रदान करती है। अत: इस दिन शुरू किया गया कोई भी कार्य निश्चित ही सिद्धि को प्रदान करने वाला है। इसमें भी यात्रा अत्यंत श्रेयस्कर होती है।

दशहरे को पूजें शमी वृक्ष
इस दिन अनेक धार्मिक अनुष्ठान करने की परंपरा शास्त्रों में है। परिवार के साथ घर से पूर्व दिशा की ओर जाकर शमी वृक्ष अर्थात खेजड़ी का पूजन करना चाहिए। खेजड़ी वृक्ष की पूजा करने के बाद उसकी टहनी घर में लाकर मुख्य चौक के अंदर प्रतिष्ठित करनी चाहिए। शमी शत्रुओं का समूल विनाश करती है। शमी के कांटे हत्या इत्यादि के पापों से भी रक्षा करते हैं। 'अर्जुन के धनुष को धारण करने वाली और भगवान श्रीराम को भी प्रिय लगने वाली शमी मेरा कल्याण करे।' हमारी संस्कृति में शमी को पवित्रतम वृक्ष माना गया है, कदाचित यही कारण रहा था कि रामायण में हनुमान जी ने माता सीता को शमी वृक्ष के समान पवित्र कहा था। शमी वृक्ष का पूजन करने से पतिव्रता स्त्रियों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और जो लोग शत्रुओं से पीड़ित हों, उन्हें विजय मिलती है। 'श्रीरामचरितमानस' के लंकाकांड में वर्णित राम-रावण युद्ध प्रसंग का पाठ करने से शत्रु पर विजय प्राप्त होती है।

अपराजिता देवी का पूजन
इसी दिन 'माता अपराजिता' का पूजन किया जाता है। अपराजिता देवी सकल सिद्धियों की प्रदात्री साक्षात माता दुर्गा का ही अवतार हैं। भगवान श्रीराम ने माता अपराजिता का पूजन करके ही राक्षस रावण से युद्ध करने के लिए विजय दशमी को प्रस्थान किया था। यात्रा के ऊपर माता अपराजिता का ही अधिकार होता है। ज्योतिष के अनुसार माता अपराजिता के पूजन का समय अपराह्न अर्थात दोपहर के तत्काल बाद का है। अत: अपराह्न से संध्या काल तक कभी भी माता अपराजिता की पूजाकर यात्रा प्रारंभ की जा सकती है। यात्रा प्रारंभ करने के समय माता अपराजिता की यह स्तुति करनी चाहिए, जिससे यात्रा में कोई विघ्न उपस्थित नहीं होता-

शृणुध्वं मुनय: सर्वे सर्वकामार्थसिद्धिदाम्।
असिद्धसाधिनीं देवीं वैष्णवीमपराजिताम्।।
नीलोत्पलदलश्यामां भुजङ्गाभरणोज्ज्वलाम्।
बालेन्दुमौलिसदृशीं नयनत्रितयान्विताम्।।
पीनोत्तुङ्गस्तनीं साध्वीं बद्धपद्मासनां शिवाम्।
अजितां चिन्तयेद्देवीं वैष्णवीमपराजिताम्।।

यात्रा के लिए दशहरा
दशमी तिथि की संज्ञा 'पूर्णा' है, अत: इस दिन यात्रा प्रारंभ करना श्रेष्ठ माना जाता है। श्री वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रवण नक्षत्र युक्त विजय दशमी को ही भगवान श्रीराम ने किष्किंधा से दुराचारी राक्षस रावण का विनाश करने के लिए हनुमानादि वानरों के साथ प्रस्थान किया था। आज तक रावण वध के रूप में विजय दशमी को अधर्म के विनाश के प्रतीक रूप में भी मनाया जाता है।


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