कृष्णावतार

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Monday, October 14, 2013-10:46 AM

सैंकड़ों वर्षों में पहली बार सभी आर्य युवक एक झंडे तले एकत्रित हुए। ‘‘जहां धर्म है वहीं जय है’’

यह था नारा इस धर्म युद्ध में लडऩे वालों का। अपनी-अपनी सेना लेकर बड़े-बड़े राजा द्वारिका की ओर चल पड़े। हर और रथों के पहियों की घरघराहट तथा घोड़ों की टापों की आवाजों से पृथ्वी बार-बार दहल रही थी। देश के कोने-कोने से महिलाएं भी आईं अपने-अपने पतियों के साथ। कंस, शिशुपाल और जरासंध को यमलोक पंहुचाने के चमत्कार पूर्ण कार्यों से कृष्ण जी का मान-सम्मान बहुत बढ़ गया था। जो लोग उनके विरोधी थे, वे भी उनकी पूजा करने लगे थे।

परंतु अब भी बहुत से राजा ऐसे थे, जो क्षात्र धर्म के पालन की प्रतिज्ञा तो कर चुके थे परंतु उसका पालन सच्चे दिल से नहीं कर रहे थे। वे आश्रमों की अपने इलाके में भी रक्षा नहीं कर पाते थे। उन्हें तो बस इसी बात से संतोष था कि कृष्ण जी जैसे महापुरुष जो अपना साम्राज्य स्थापित नहीं करना चाहते, हमारी रक्षा करने के लिए मौजूद हैं।

यज्ञशाला में मुनि द्वैपायन तथा भीष्म  पितामह ने कृष्ण जी की जो अग्रपूजा करवाई थी उसका महत्व पहले तो स्वयं श्री कृष्ण जी भी नहीं समझ पाए थे, और सच तो यह है कि उन दोनों महापुरुषों के इरादों को उस समय कोई भी नहीं समझ सका था और जब परम पूजनीय मुनिवर उनकी ओर बढ़े थे तो सभी मौन साधे बैठे रहे थे।   
                                                                                                                                                                                                                            (क्रमश:)

 


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