हनुमान जी ने रावण की माता की आंखों में क्यों घुसेड़ी हरी र्मिच

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Saturday, October 19, 2013-7:47 AM

राम रावण युद्ध के समय जब लक्ष्मण जी मूर्छित थे तो हनुमान जी संजीवनी के रूप में पर्वत ही लेकर आ गए। संजीवनी आगमन के उपरांत राज वैध श्री सुषैण ने कहा कि इस संजीवनी को खरल में रगडऩे के लिए दो चार बूंदे आंसूओं की चाहिए और वो आंसू उस व्यक्ति के होने चाहिए जो आपने जीवन काल में कभी रोया न हो। गंभीर समस्या खड़ी हो गई। आखिर वैध सुषेण जी ने ही उपाय सुझाया कि, रावण की माता निकसा अपने जीवन काल में कभी नहीं रोई, अगर उसके आंसू मिल जाए तो शीघ्र ही लक्ष्मण जी की मूर्छा को दूर किया जा सकता है।

हनुमान जी इस कार्य के लिए लंका में रावण की माता के राजभवन में गए। हनुमान जी ने पहले तो रावण की माता को जाकर प्रेमपूर्वक बोला,"माता जी!आपको रोना पड़ेगा। आप शीघ्र रोएं, हमें आपके आंसू की दो चार बूंदे अभी चाहिए।"

रावण की माता क्रोधित होते हुए हनुमान जी से बोली,"चले जाओ यहां से हम क्यों रोएंगे, हम किसी किम्मत पर नहीं रोएंगे। एक तो तुम दुश्मन हो ऊपर से तुम्हारा इतना साहस हमें रोने को कह रहे हो।"

जब हनुमान जी ने अपने साथ लाई हुई दो बड़ी हरी र्मिच रावण की माता की बड़ी बड़ी राक्षसी आंखों में घुसेड़ दी तो वो एकदम चिल्लाकर ऊंचे स्वर में रोने लगी। उसकी आंखों से टपटप आंसूओं की छड़ी लग गई। हनुमान जी बहुत प्रसन्न हुए उनका काम जो बन गया था। उन्होंने झटपट कुछ आंसुओं की बूंदे संचित की और अपनी पवन गति से मूर्छा स्थल पर आ गए। वैध ने संजीवनी में आंसू की बूंदे मिश्रित कर खरल किया और उसके सूघंने से लक्ष्मण जी को जीवन दान मिला।

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