करवा चौथ: पति - पत्नी के आजीवन प्रेम की आत्मीय अभिव्यक्ती

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Monday, October 21, 2013-7:06 AM

पति के स्वास्थ्य, लम्बी आयु, और सौभाग्य के साथ-साथ संतान सुख प्राप्त करने के लिए विवाहित महिलाओं द्वारा करवाचौथ का व्रत रखा जाता है। यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को होता है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखते हुए शाम को व्रत के महात्म की कथा सुनती हैं और रात में चंद्रमा निकलने पर उसे अर्ध्य देकर भोजन करके व्रत का परायण करती हैं।

करवाचौथ का व्रत रखने वाली महिलाओं द्वारा मिलकर व्रत की कथा सुनते समय चीनी अथवा मिट्टी के करवे का आदान-प्रदान किया जाता है तथा घर की बुजुर्ग महिला जैसे ददिया सास, सास, ननद या अन्य सदस्य को बायना, सुहाग सामग्री, फल, मिठाई, मेवा, अन्न, दाल आदि एवं धनराशि देकर और उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लिया जाता है। इस व्रत में भगवान शिव शंकर, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और चंद्र देवता की पूजा-अर्चना करने का विधान है।

करवाचौथ की यह कथा सुनने से विवाहित महिलाओं का सुहाग बना रहता है, उनके घर में सुख, शान्ति,समृद्धि और सन्तान सुख मिलता है। महाभारत में भी करवाचौथ के महात्म पर एक कथा का उल्लेख मिलता है, जिसके अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को करवाचौथ की यह कथा सुनाते हुए कहा था कि पूर्ण श्रद्धा और विधि-पूर्वक इस व्रत को करने से समस्त दुख दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-सौभाग्य तथा धन-धान्य की प्राप्ति होने लगती है। श्री कृष्ण भगवान की आज्ञा मानकर द्रौपदी ने भी करवा-चौथ का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही अर्जुन सहित पांचों पांडवों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की सेना को पराजित कर विजय हासिल की।

करवाचौथ के व्रत में चन्द्रमा निकलने तक कुछ भी अन्न-जल ग्रहण नहीं किया जाता है, इसलिए व्रत रखने से पूर्व महिलाओं को एक दिन पहले रात्रि में अपनी रुचि के अनुसार भोजन, मिष्ठान, फल आदि का सेवन अवश्य कर लेना चाहिए।
                                                                                                                                      - प्रमोद कुमार अग्रवाल


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