'शांति के लिए सद्गुण जरूरी हैं, ये गुण नहीं होने पर त्रिकाल में शांति नहीं मिलती'

  • 'शांति के लिए सद्गुण जरूरी हैं, ये गुण नहीं होने पर त्रिकाल में शांति नहीं मिलती'
You Are HereDharm
Monday, October 21, 2013-5:06 PM

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता
'शांति के लिए सद्गुण जरूरी हैं, ये गुण नहीं होने पर त्रिकाल में शांति नहीं मिलती।'


नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम्।।
(अध्याय दो, श्लोक 66)

अशांत मनुष्य के अंत: करण  में न ईश्वर का ज्ञान होता है, न ईश्वर की भावना। भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नबीं मिलती और अशांत मनुष्य को सुख कहां? वह बुद्धि सात्विक होती है जो हमें ईश्वर, आध्यात्म, ज्ञान व पवित्रता की तरफ ले जाती है। अ‘छे गुणों वाला मनुष्य ही योग्य है। ये गुण नहीं होंगे तो त्रिकाल में भी सुख-शांति नहीं मिलेगी। जीवन में विवेक व सद्बुद्धि का अभाव होने पर व्यक्ति अन्दर से अशांत होगा।

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमाप: प्रविशान्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्रोन्ति न कामकामी।। (अध्याय दो, श्लोक 70)

जैसे सभी नदियों के जल समुद्र को विचलित किए बिना पूर्ण रूप से समुद्र में समा जाते हैं वैसे ही सभी प्रकार के भोग- विलास जिस संयमी मनुष्य में विकार उत्पन्न किए बिना समा जाते हैं, वहीं मनुष्य शांति प्राप्त करता है, भोग-विलास जिस संयमी मनुष्य में वितार उत्पन्न किए बिना समा जाते हैं, वही मनुष्य शांति प्राप्त करता है, भोगों की कामना करने वाले व्यक्ति को शांति नहीं मिलती है। जिस प्रकार नदियां अपने मार्ग में आने वाली सभी प्रकार की वस्तुओं को बहा कर समुद्र में ले जाती हैं, उसी प्रकार कामनाओं की नदी की प्रचंडधारा का तेज आवेग भी भौतिकवादी व्यक्ति के मन को बहाकर ले जाता है। योगी का मन उस महासागर की तरह है जिसमें कामना रूपी सरिताएं बिना आंदोलित किए समाहित हो जाती है। मानव कामनाएं अनंत हैं। मन को जीते बिना मरने वाले  व्यक्तित को बार-बार जन्म लेना पड़ता है। मन जीत लेने पर जन्म- मरण से मुक्ति मिल जाती है।

पवित्र  कुरान

‘तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिए, मेरा धर्म मेरे लिए सही और हम आपस में शांतिपूर्ण बर्ताव करें’

...और इंकार करने वालों को एक दु:खद यातना की शुभ सूचना दे दो, सिवाय उन मुशरिकों के जिनसे तुमने संधि-समझौते किए, फिर उन्होंने तुम्हारे साथ अपने वचन को पूर्ण करने में कोई कमी नहीं की और न तुम्हारे विरुद्ध किसी की सहायता ही की तो उनके साथ उनकी संधि को उन लोगों के निर्धारित समय तक पूरा करो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखने वाले प्रिय हैं। (कुरआन 9 : 4)

पैगंबर को सख्त हिदायत दी गई कि उन मुशरिकों के साथ शांति से रहना जो तुम्हारे साथ शांति से रहते हैं। अपने बचाव के लिए उन्हीं से युद्ध करना जिन्होंने शांति समझौता तोड़ दिया है और अब युद्ध पर आमादा हैं। संयम भी रखें, हो सकता है शत्रु सद्बुद्धि प्राप्त कर ले और शांति स्थापित हो जाए। अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उनके साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है। (कुरआन 60 : 8)

कुरआन के 60वें अध्याय की 8वीं आयत में धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के उन लोगों से सज्जनता के साथ और न्यायोचित बर्ताव करने का आदेश दिया जाता है जो उनके अपने धर्म के लोगों के साथ मात्र मान्यताओं और आस्थाओं की खातिर बैर न रखते हों। कुरआन के 60वें अध्याय की 9वीं आयत में कहा गया है कि जो लोग आस्था की खातिर तुमसे बैर रखते हों वे मित्रता के काबिल नहीं होते हैं।  

-डॉ. मोहम्मद इकबाल सिद्दीकी, इस्लामी विद्वान, जयपुर

पवित्र बाइबिल

‘थके मांदे और बोझ से दबे हुए लोगो तुम सभी मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जुआ अपने-अपने ऊपर ले लो और मुझसे सीखो। मैं स्वभाव से नम्र और विनीत हूं। इस तरह तुम अपनी आत्मा के लिए शांति पाओगे, क्योंकि मेरा जुआ सहज है और मेरा बोझ हल्का।’ (संत मत्ती 11 : 28-30)

ईसा उन सभी लोगों को अपने पास बुलाते हैं जो थके हैं, सांसारिक मोह-माया के बोझ तले दबे हैं। जिनका मन अशांत है। वे कहते हैं कि तुम अपनी सांसारिक चिंताएं छोड़कर मेरे पास आओ मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। तुम भी मेरी तरह स्वभाव से नम्र और विनीत बनो क्योंकि शांति पाने के लिए दिल से नम्र बनना जरूरी है। बिना इसके शांति नहीं मिल सकती।

परन्तु वह सहायक, वह पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम पर भेजेगा ,तुम्हें सब कुछ समझा देगा। मैं ने तुम्हें जो कुछ बताया वह उसका स्मरण दिलाएगा। ‘मैं तुम्हारे लिए शांति छोड़ जाता हूं। अपनी शांति तुम्हे प्रदान करता हूं। वह संसार की शांति जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराए नहीं। भीरू मत बनो।’  (संत योहन 14:26-27)

ईसा शांति की स्थापना के लिए ही इस दुनिया में आए। जब वे यह संसार छोड़कर जाने लगे तो उन्होंने अंतिम ब्यालू के समय अपने शिष्यों से कहा मैं अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूं। मेरे जाने के बाद तुम दूसरों तक इस शांति के संदेश को पहुंचाओ। उनके बारह शिष्यों ने उनके चले जाने के बाद उनके संदेश को जन-जन तक पहुंचाया।


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You