कृष्णावतार

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Tuesday, October 22, 2013-9:08 AM

द्वैपायन (भगवान वेद व्यास जी) तो आश्रम के पुनर्स्थापन और उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाने और उनकी शक्ति बढ़ाने के लिए वर्षों काम करते रहे थे। आर्यों के संगठन के लिए भी वह वर्षों काम करते रहे थे और उन्होंने इसके लिए बड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया था। आर्य-अनार्य, नाग, राक्षस सब उनका सम्मान करते थे और वह सब की भाषा बड़ी सरलता से बोलते थे।  मुनि द्वैपायन सब के पास जाते और उपदेश देते रहते थे।


उन्होंने वेदों का संकलन किया था और अब चारों वेद लिखे हुए देव वाणी के रूप में सब आर्यों के सामने थे। श्रोत्रीयगण कठोर नियमों का पालन करते थे अपने-अपने आश्रमों में। जीती-जागती देव वाणी त्रैलोक्य में व्याप्त थी और जीवन के दिन गिने-चुने थे मानव के लिए, इसलिए मुनि देव आवश्यक समझते थे कि पवित्र अग्नि प्रज्वलित रखी जाए और मंत्र पाठ चलता रहे और जल्द ही यह आश्रम चारों ओर ज्ञान का पाठ फैलाने लगा। 
                                                                                                                                                                       (क्रमश:)

 


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