कार्तिक माह में क्यों करते हैं सूर्योदय से पूर्व स्नान व दीपदान

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Wednesday, October 23, 2013-7:39 AM
 

पुराणों में कार्तिक मास की महिमा का उल्लेख इस प्रकार मिलता है :

न कार्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगम्।

न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थं गंगा समम्।।

अर्थात: कार्तिक के समान दूसरा कोई मास नहीं, सतयुग के समान कोई युग नहीं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है।

स्कन्द पुराण में वर्णित है कि समस्त महीनों में कार्तिक मास, देवताओं में भगवान श्री हरि, तीर्थों में बद्रीनारायण शुभ हैं। कलियुग में जो इनकी पूजा करता है वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष को प्राप्त करता है। शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास में किये गये दान पुण्य का फल व्यक्ति को अगले जन्म में अवश्य प्राप्त होता है।

दीपदान का कार्तिक माह में विशेष महत्व है। शास्त्रों के मतानुसार चार माह के उपरांत भगवान श्री हरि अपनी योगनिद्रा से जागते हैं। पदमपुराण के मतानुसार कार्तिक माह में दीपदान करने से भगवान श्री हरि की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में छाया अंधकार दूर होता है। अश्वमेघ यज्ञ के बराबर फलों की प्राप्ति होती है। मंदिरों में और नदी के किनारे दीपदान करने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। जीवन में छाया अंधकार दूर होता है। नए प्रकाश में जातक नई राहों को तलाशते हैं। दीपदान करने से सुख तथा समृद्धि तो बढ़ती ही है, साथ ही सौभाग्य में भी वृद्धि होती है।

कार्तिक माह में किए स्नान का फल एक हजार बार किए गंगा स्नान के समान व सौ बार किए गए माघ स्नान, वैशाख माह में नर्मदा नदी पर किए गए करोड़ बार स्नान के समान माना गया है। कहा गया है कि जो फल कुम्भ में प्रयाग में स्नान करने पर मिलता है, वही फल कार्तिक माह में किसी पवित्र नदी के तट पर स्नान करने से मिलता है। पद्म पुराण के मतानुसार जो जातक समस्त कार्तिक माह में सूर्योदय से पूर्व उठकर नदी अथवा तालाब में स्नान करता है और भगवान विष्णु की पूजा करता है। भगवान विष्णु की उन पर असीम कृपा होती है। हमारे वेद एवं पुराणों में कार्तिक-स्नान को बेहद पावन, समृद्धिदायक एवं कल्याणकारी स्नान के रूप में वर्णित किया गया है। यथा :

कार्तिक मासी ते नित्यं तुलासंस्थे दिवाकरे।

प्रात: स्नास्यंति ते मुक्ता महापातकिनोदपि च।।

अर्थात: जो मनुष्य तुला की संक्राति रहते हुए कार्तिक मास में प्रात:काल स्नान करते हैं, वे यदि बड़े से बड़े पापी हों तो भी वे उनसे मुक्त हो जाते है

 


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