कैसे मनाते हैं कंगालों का महोत्सव

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Monday, October 28, 2013-2:34 PM
श्रील गौर किशोर दास बाबा जी महाराज जी ने जीवन भर उत्कट वैराग्य का पालन किया। वे गंगा जी के तट पर मरे हुए व्यक्तियों के पड़े वस्त्रों को गंगा जी में धो कर उसे कोपिन बनाकर पहन लेते थे। सज्जन गृहथियों के घर में चावल भिक्षा करके उन्हें गंगा जल में धो कर उसमें नमक इत्यादि कुछ मिलाकर ग्रहण कर लेते थे। वे कभी भी किसी की भी खुशामद नहीं करते थे।

यदि कुछ भी भिक्षा न मिली तो वे किसी से कुछ न कहके चुपचाप गंगा जी की रेत खा लेते व ऊपर से गंगा जल पान कर लेते थे। वास्तव में वे संपूर्ण तथा निरपेक्ष पुरूष थे। उनकी एक आदत यह भी थी कि वे सर्व साधारण कोई उपदेश नहीं देते थे परंतु उनका शुद्ध चरित्र देखकर सभी आकर्षित हो जाते थे। वास्तव में वे अपने आचरण से जगत में असली भागवत धर्म स्थापित कर गए।

एक बार की बात है श्री सनातन गोस्वामी जी की तिरोभाव तिथी के एक दिन पहले श्रील गौर किशोर दास बाबा जी महाराज जी अपने सेवको से कहने लगे कि कल श्री सनातन गोस्वामी जी की अप्रकट तिथी है। सो कल हम लोग महात्सव करेंगे। बाबा जी के मुख से महोत्सव की बात सुन कर अनके एक निकटस्थ सेवक ने पूछा, बाबा जी महोत्सव के लिए अवश्यक वस्तुएं कहां से मिलेंगी।

तो बाबा जी ने कहा कि किसी से कुछ नहीं कहना, हम एक समय का भोजन न करके निरंतर केवल हरिनाम करेंगे। यही हम कंगालों का महोत्सव है।


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