कृष्णावतार

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Monday, October 28, 2013-9:25 AM

एक ओर तो आश्रम वासी यज्ञ कुंड में अग्नि प्रज्वलित रखते और मंत्र पाठ करते रहते थे दूसरी ओर वह राजाओं के अत्याचार पूर्ण व्यवहार को समाप्त करके उन्हें शांतिपूर्ण जीवन बिताने के लिए तैयार करते जाते थे। इतने पर भी कभी-कभी आश्रमों को तबाह करने के लिए पवित्र अग्नि में अपवित्र चीजें डालने और श्रोत्रियों के यज्ञोपवीत तोड़ डालने के लिए राक्षस जंगलों से निकल आते थे। राजसूज्ञ यज्ञ में जो घटनाएं हुई थीं उनसे आश्रमों में रहने वाले श्रोत्रियों को उत्साह बहुत बढ़ गया था।

सच तो यह है श्री कृष्ण जी के चमत्कारपूर्ण कार्यों के विषय में जिस किसी ने भी सुना उसी के हृदय में उनके लिए अपूर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ ही भय भी उत्पन्न होने लगा। इस प्रकार श्री कृष्ण भगवान के रूप में मान कर पूज्य जाने लगे थे और जब अचानक ही कृष्ण जी की अग्र पूजा की गई और उसका महत्व सब ने और स्वयं श्री कृष्ण जी ने यह भी समझ लिया कि मुझ पर धर्म से संबंधित सारी जिम्मेदारियों का बोझ डाल दिया गया है। धर्म गुप्त (धर्म का संरक्षक) तो चक्रवर्ती से भी कहीं अधिक महान होता है।
                                                                                                                                                                                      (क्रमश:)

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