भविष्य का ज्ञाता है सामुद्रिक ज्योतिष

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Tuesday, October 29, 2013-7:25 AM

ज्योतिष सबसे पुराना विषय है क्योंकि मनुष्य जाति के इतिहास की जितनी खोजबीन हो सकी उसमें ऐसा कोई भी समय नहीं था जब ज्योतिष मौजूद न रहा हो। सामुद्रिक ज्योतिष विषय को हस्त रेखा विज्ञान के नाम से जाना जाता है। यह अपने आप में समृद्ध ज्योतिषशास्त्र है। जिसमें शरीर के अंगों, त्वचा के रंग, हथेली की रेखाओं, चिन्हों एवं नाखूनों के साथ ही हथेली के आकार का भी गूढ़ अध्ययन होता है।

जीसस से 25 हजार वर्ष पूर्व सुमेर में मिले हुए हडडी के अवशेषों पर ज्योतिष के चिन्ह अंकित है। पश्चिम में,पुरानी से पुरानी जो खोजबीन हुई है। वह जीसस से 25 हजार वर्ष पूर्व इन हड्डियों की है। जिन पर ज्योतिष के चिन्ह और चंद्र की यात्रा के चिन्ह अंकित है।

सामुद्रिक ज्योतिष का जन्म आज से करीब 5000 ई. पू. माना जाता है। सामुद्रिक ज्योतिष के रचियता कुमार कार्तिकेय है। जिन्होंने अपने पिता भगवान शिव जी की प्रेरणा से इसकी रचना की। रचना के समय ही सामुद्रिक ज्योतिष ज्ञान को गणेश जी ने उठाकर समुद्र में फेंक दिया। शिव जी के कहने पर समु्द्र ने उसे वापस लौटा दिया इस तरह ज्योतिष की यह विधा सामुद्रिक ज्योतिष कहलायी। सामुद्रिक ज्योतिष महासागर की तरह गहरा है। इस सदर्भ में यह भी कहा जाता है कि ऋषि समुद्र ने इसे पुष्पित और पल्लवित किया जिसके कारण भी यह सामुद्रिक ज्योतिष के नाम से विख्यात है। वर्तमान में "किरो" ने हस्तरेखा विज्ञान का प्रचार प्रसार किया।

नवग्रह पूजन का विशेष महत्व ग्रंथ-पुराणों में वर्णित है। सभी प्रकार की पूजाओं में नवग्रह पूजन का विशेष महत्व है। ग्रहों की कुल संख्या 9 है और हथेली पर जितने भी ग्रह हैं उन सबके लिए अलग अलग स्थान निर्धारित किया गया है। ग्रहों के लिए निर्घारित स्थान को ही पर्वत कहा गया है। ये पर्वत हमारी हथेली पर चुम्बकीय केन्द्र हैं। जो अपने ग्रहों से उर्जा प्राप्त कर मस्तिष्क और शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचाते हैं। भारतीय संस्कृति में नवग्रह-उपासना का उतना ही महत्व है, जितना कि भगवान विष्णु, शिव तथा अन्य देवोपासना का है। जन्म से लेकर उपनयन, विवाह आदि संस्कारों में नवग्रह पूजन का विशेष महत्व है।

 


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