रमा एकादशी व्रत प्रदान करे धन वैभव और मोक्ष

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Tuesday, October 29, 2013-10:04 AM

दीपावली से चार दिन पूर्व कार्तिक मास की एकादशी रमा एकादशी के नाम से प्रसिद्घ है, इसका नाम लक्ष्मी जी के नाम पर होने के कारण  इसे रमा एकादशी के नाम से जाना जाता है। 

कैसे करें पूजन एवं व्रत: कार्तिक मास में तो प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठने और स्नान करने का विधान है इसी कारण प्रात: उठकर केवल स्नान करने मात्र से ही मनुष्य को कई हजार यज्ञों का फल मिल जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु के पूर्णावतार भगवान जी के केशव रूप की विधिवत धूप, दीप, नेवैद्य एवं फलों से पूजा की जाती है। इस दिन किए गए पुण्य कर्म में श्रद्घा भक्ति एवं आस्था से ही मनुष्य को स्थिर पुण्य फल की प्राप्ति हो सकेगी। इस दिन अन्न का सेवन नहीं किया जाता, केवल फलाहार ही करना चाहिए। रात्रि को भगवान का जागरण करना चाहिए। ब्राह्मण को अन्न, धन, अथवा वस्त्र दक्षिणा सहित दान में देने चाहिएं।

क्या है पुण्य फल
इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी पाप नष्ट होंगे, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं तथा घर में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती। इस प्रकार जीव को सभी प्रकार के सुखों के साथ ही धन, वैभव और मोक्ष की होती है।

शास्त्रानुसार एकादशी चाहे कृष्ण पक्ष की हो, चाहे शुक्ल पक्ष की, उसमें कोई भेद नहीं है। चाहे काली गाय का हो, चाहे सफेद गाय का , दूध तो दोनों का ही सफेद होगा, इसी प्रकार  भगवान को  दोनों पक्षों की एकादशी बहुत प्रिय है। सभी को अपनी सुख समृद्धि के लिए हर मास में  आने वाली दोनों एकादशियों का व्रत सच्चे मन से श्रद्धाभाव से करना चाहिए।

रमा एकादशी की कथा

प्राचीन काल में मुचकंद नाम का राजा विष्णुभक्त, धर्मात्मा व न्यायप्रिय था। उसकी राजा इन्द्र, यम, वरुण तथा विभीषण आदि के साथ बड़ी मित्रता थी। उसकी एक कन्या चन्द्रभागा थी जिसका विवाह चन्द्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ। एक बार शोभन अपने ससुराल आया हुआ था तो  कार्तिक मास के कृष्ण  पक्ष की रमा एकादशी आ गई जिसके लिए राजा ने दशमी के दिन ही सारे राज्य में व्रत करने की घोषणा करवा दी। राजा के नगर में सभी लोगों को एकादशी का व्रत करना पड़ता था।

चन्द्रभागा को अपने पति की चिंता होने लगी क्योंकि वह बहुत निर्बल था तथा व्रत करना उसके वश में नहीं था परंतु राजा  के व्रत रखने  की कठोर  आज्ञा का पालन करते हुए उसने भी अपनी पत्नी के साथ रमा एकादशी का व्रत किया तथा किसी प्रकार का अन्न ग्रहण नहीं किया। रात को जब सभी वैष्णव रात्रि जागरण में समय बिता रहे थे तो भूख से पीड़ित शोभन ने अपने प्राण त्याग दिए।  चन्दन की चिता सजाकर शोभन का संस्कार किया गया तथा मुचकंद की पुत्री चन्द्रभागा अपने पिता के घर में ही रहने लगी।   

रमा एकादशी के प्रभाव से शोभन मन्द्राचल पर्वत पर धन धान्य से परिपूर्ण होकर सुन्दर देवपुर को प्राप्त हुआ।  वहां शोभन को हर प्रकार की सुख सुविधाएं प्राप्त थीं। उसका वैभव  देवराज इन्द्र से कम नहीं लग रहा था। एक बार मुचकंद नगरी का रहने वाला  सोम शर्मा नामक ब्राह्मण तीर्थ यात्रा करता हुआ उस नगरी से गुजरा जहां शोभन  बड़े वैभव के साथ रह रहा था। ब्राह्मण ने शोभन को पहचान लिया तथा उससे पूछा कि उसे यह दिव्य नगर कैसे प्राप्त हुआ तो शोभन ने कहा कि रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ही उसे यह अस्थायी नगर रहने के लिए मिला है।

उसने अपनी पत्नी चन्द्रभागा की भी कुशल क्षेम पूछी तथा उस नगर के स्थिर होने के उपाय के बारे में पूछा। सोम शर्मा जब वापस आया तो उसने शोभन  से मिलने की  सारी बात चन्द्रभागा को बताई। चन्द्रभागा ने उस ब्राह्मण को अपने पति से मिलाने के लिए कहा तो सोम शर्मा उसे लेकर मन्द्राचल पर्वत के समीप वामदेव ऋषि के आश्रम में गया जहां  ऋषि वामदेव ने सारी बात सुनकर चन्द्रभागा का अभिषेक किया।

ऋषि मंत्र तथा चन्द्रभागा के एकादशी व्रत के प्रभाव से उसका शरीर दिव्य हो गया तथा  चन्द्रभागा अपने पति से मिली। शोभन उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुआ।  उसने अपनी पत्नी को अपने बाईं ओर बैठाया।  चन्द्रभागा ने कहा कि वह जब आठ वर्ष की थी तबसे एकादशी का व्रत करती आ रही है। उसने अपनी सभी एकादशियों का फल अपने पति के निमित्त संकल्प किया जिसके प्रभाव से वह नगर स्थिर हो गया  तथा चन्द्रभागा वहां  दिव्य  रूप धारण कर, दिव्य आभूषणों और वस्त्रों से सुसज्जित होकर अपने पति शोभन के साथ रहने लगी। एकादशी का व्रत परम कल्याणकारी है तथा जिस कामना से कोई इस एकादशी का व्रत करता है उसकी सभी कामनाएं पूरी हो जाती हैं तथा उसके सभी पाप भी नष्ट हो जाते हैं।


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