यहां भगवान शिव को महाअग्नि तुल्य स्तम्भ के रूप में प्रकट होना पड़ा

  • यहां भगवान शिव को महाअग्नि तुल्य स्तम्भ के रूप में प्रकट होना पड़ा
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Wednesday, October 30, 2013-7:01 AM
 पंजाब हिमाचल प्रदेश में काठगढ़ नामक स्थान को जगत विख्यात जन जन में वंदनिय व प्रात स्मरणिय होने का गौरव प्रदान किया है। इस मंदिर को जाने के लिए जालंधर पठानकोट मार्ग पर मीरथल नामक कस्बा है। उसी स्थान से ही काठगढ़ मंदिर को रास्ता जाता है। इस मार्ग की लम्बाई चार किलोमीटर तक है। इस मंदिर में भगवान शिव का महान लिंग है।

शिव पुराण को विधेश्वर संहिता में इस शिवलिंग के प्राकटय की एक अनोखी कथा मिलती है। पदमकल्य के आरंभ में एक बार ब्रहमा जी और विष्णु जी के मध्य श्रेष्ठता का विवाद उत्पन्न हो गया और वह दोनों दिव्य अस्त्र लेकर युद्ध हेतु उन्मुख हो उठे। उन के बीच शिवजी सहसा वहां अनादि अनंत ज्योतिर्मय स्तम्भ के रूप में प्रकट हो गए। दोनों देवताओं के दिव्यास्त्र स्वत शांत हो गए।

ब्रहमा जी और विष्णु जी ने उस प्रकाश स्तंभ के आदि अंत को खोजने का बहुत प्रयास किया। विष्णु जी शुक्र का रूप धारण करके उस स्तंभ का मूल देखने के लिए नीचे की ओर चले गए तथा ब्रहमा जी हंस का रूप धारण कर ऊपर की ओर गमन कर गए। विष्णु जी पाताल में बहुत गहरे तक तले गए परंतु जब बहुत समयोपरांत भी स्तंभ के अंत का पार न पा सके तो वापिस चले गए। उधर ब्रहमा जी आकाश में आ कर केतकी का फूल लेकर विष्णु के पास गए और झूठ ही अपनी खोज को साकार बताया कि मैं स्तंभ का अंत देख आया हूं। जिसके ऊपर वह केतकी का फूल था।

ब्रहमा जी के इस छल को देख कर भगवान शिव को वहां साक्षात प्रकट होना पड़ा और तब विष्णु जी ने उनके चरण पकड़ लिए। विष्णु जी की इस महानता को देखकर भगवान शिव बहुत खुश हुए तथा उन्हें अपनी समानता प्रदान करी। यही वह काठगढ़ स्थान है। यहां भगवान शिव को महाअग्नि तुल्य स्तम्भ के रूप में प्रकट होना पड़ा।

ईशान संहिता में भी वर्णित है कि फाल्गुण मास को कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्रि में आदि देव शिव करोड़ो सू्र्य के समान प्रभाव वाले लिंक के रूप में प्रकट हुए थे। यही शिवलिंग में प्रादुर्भाव का स्थान है तथा यहीं अर्ध रात्रि में शिवलिंग का अविर्भाव हुआ था।

काठगढ़ मंदिर की महत्ता के बारे में एक अन्य कथा अनुसार बताया जाता है कि त्रेतायुग में भगवान राम के अनुज भरत जी शिव भक्त थे।वे जब भी ननिहाल जाते कैकय देश जाया करते थे तो वे काठगढ़ में ही विश्राम किया करते थे। भरत जी व्यास के पवित्र जल में स्नान करने के उपरांत अपने राजपुरोहितों व मंत्रियों सहित इस आदि शिवलिंग की पूजा अर्चना किया करते थे।


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