अहंकार कोई नई यात्रा कर रहा है

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Tuesday, November 05, 2013-11:22 AM

प्रेम में ईर्ष्या हो तो प्रेम ही नहीं है, फिर प्रेम के नाम से कुछ और ही रोग चल रहा है। ईर्ष्या सूचक है प्रेम के अभाव की। यह तो ऐसा ही हुआ, जैसा दीया जले और अंधेरा हो। दीया जले तो अंधेरा होना नहीं चाहिए। अंधेरे का न होना ही दीए के जलने का प्रमाण है। ईर्ष्या का मिट जाना ही प्रेम का प्रमाण है। ईर्ष्या अंधेरे जैसी है। प्रेम प्रकाश जैसा है। इसको कसौटी समझना।


जब तक ईर्ष्या रहे तब तक समझना कि प्रेम प्रेम नहीं। तब तक प्रेम के नाम से कोई और ही खेल चल रहा है। अहंकार कोई नई यात्रा कर रहा है। प्रेम के नाम से दूसरे पर मालकियत करने का मजा, प्रेम के नाम से दूसरे का शोषण, दूसरे व्यक्ति का साधन की भांति उपयोग और दूसरे व्यक्ति का साधन की भांति उपयोग जगत में सबसे बड़ी अनीति है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति साध्य है, साधन नहीं। तो भूल कर भी किसी का उपयोग मत करना। किसी के काम आ सको तो ठीक लेकिन किसी को अपने काम में मत ले आना।

इससे बड़ा कोई अपमान नहीं है कि तुम किसी को अपने काम में ले आओ। इसका अर्थ हुआ कि परमात्मा को सेवक बना लिया। सेवक बन सको तो बन जाना लेकिन सेवक बनाना मत। असली प्रेम उसी दिन उदय होता है जिस दिन तुम इस सत्य को समझ पाते हो कि सब तरफ परमात्मा विराजमान है। तब सेवा के अतिरिक्त कुछ बचता नहीं। प्रेम तो सेवा है, ईर्ष्या नहीं। प्रेम तो समर्पण है, मलकियत नहीं।


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