आप धनवान बनना चाहते हैं या लक्ष्मीवान

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Friday, November 08, 2013-9:27 AM
आजकल लोग भगवती लक्ष्मी को केवल धन के लिए पूज रहे हैं, जबकि धन-संपत्ति उनकी विभूति मात्र है। हम लक्ष्मी को धन का पर्याय समझने की भूल कर बैठे हैं। सच तो यह है कि धन केवल इन देवी की एक कला मात्र है इसलिए 'धनवान' होना और 'लक्ष्मीवान' होना, ये दो अलग-अलग बातें हैं। सही मायनों में लक्ष्मी का पर्यायवाची शब्द केवल 'श्री' ही है। वेद में वर्णित श्रीसूक्त की ऋचाओं के द्वारा लक्ष्मी जी का आवाहन किया जाता है।

भगवती की अनुकंपा से धन-संपत्ति के साथ-साथ प्रतिष्ठा, निरोगता, सद्बुद्धि, सुख, शांति और वैभव की प्राप्ति भी होती है। इसी कारण युगों से मानव 'श्रीमान' बनने की कामना करता रहा है, किंतु सच्चा श्रीमान वही है, जो धन पाने के बाद धर्म के पथ से विमुख न हो यानी अहंकार के वशीभूत होकर बुरे कर्म न करें। स्वार्थी होने के बजाय परमार्थी बने।

भगवान धर्म की मूर्ति हैं, जो भगवान को नहीं छोड़ता उसको भगवान नहीं छोड़ते। अति दुख में पांडवों ने भगवान को नहीं छोड़ा इसलिए वह पांडवों के साथ रहे। सुख-दुख मान अपमान कैसा भी प्रसंग क्यों न हो अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। मानव शरीर धर्म का क्षेत्र है। लोग बड़ी बड़ी ज्ञान की बातें करते हैं परंतु धर्म नहीं निभाते कितने लोग जगत को दिखाने के लिए कोरी भक्ति करते हैं। जिस ज्ञान में धर्म का स्थान नहीं है वह ज्ञान टिकता नहीं है। ज्ञान का रक्षण धर्म से ही होता है।


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