...वो द्वार जहां खुलता है स्‍वर्ग का रास्‍ता

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Saturday, November 09, 2013-9:33 AM
प्रत्येक व्यक्ति के मन में तीर्थाटन की भावना किसी न किसी रूप में विधमान रहती है। पाप का शमन एवं पुण्य का अर्जन तीर्थ यात्रा का मुख्य उद्देश्य रहता है। शास्त्रों में तीर्थों की अनेक परिभाषाऐं दी गई हैं। गरूड़पुराण में कहा गया है, तीर्थ सब पापों का विनाश करके भक्ति मुक्ति प्रदान करने वाले हैं।

तीर्थ शब्द का अर्थ है पवित्र। अत: तीर्थ उस स्थान को कहा जाता है जिसका सेवन करने से समस्त पापों का क्षय होता है, व्यक्ति पवित्र होता है एवं पुण्य अर्जित होते हैं। जिसके फलस्वरूप लौकिक सुखों में अभिवृद्धि होती है एवं स्वर्ग की प्राप्ति होती है। तीर्थ में शरीर का अंत होने पर मुक्ति सुनिश्चत है। इस आधार पर तीर्थों को निम्न शीर्षों के अन्तर्गत रखा जा सकता है।

नित्य तीर्थ शाशवत तीर्थ जो सृष्टि के आदि से अंत तक विधमान रहते हैं यथा काशी, मथुरा, कैलाश आदि।

भागवत तीर्थ जहां प्रभु ने अवतार लिया हो एवं अवतार काल में विभिन्न लीलाएं की हों यथा अयोध्या, मथुरा, चित्रकूट, द्वारिका आदि।

भक्त तीर्थ जहां भक्तों ने संत महात्माओं ने अवतार लिया हो, भगवत्प्राप्ति की हो जैसे सुदामापुरी, किष्किन्धा, मूंगी आदि।

कर्म तीर्थ जहां देवताओं ने राजर्षियों ने, महात्माओं ने, भक्तों आदि ने साधना करके अनुष्ठान करके सिद्धि प्राप्त की हो, भगवत्प्राप्ति की हो यज्ञ आदि पवित्र कर्मो का निष्पादन किया हो जैसे पुष्कर, निम्बग्राम आदि।

 


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